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जीवराज जैन ग्रम्थमाला, हिंस्दी विभाग पुष्प २९

प्रन्थमाला-सम्पादक

सिद्धान्ताच्षार्य श्री पं० केछाशचन्द्रजी शास्त्री

अआवकाचार सथ्रह् ( छाटीसंहिता आदि १९ श्रावकाचारों का संग्रह )

साग

सम्पादक एवं अनुवादक

सिद्धान्ताचार्य पं० होरालाल शास्त्री, न्‍्यायतीर्थ व्यवस्थापक ऐलक पत्नालाड दि० जैन, सरस्वती भवन, व्यावर ( राजस्थान )

प्रकाशक सेठ लालचन्द हीराचन्द अध्यक्ष, जैन-सस्कृति-संरक्षक-संघ, शोलापुर (महाराष्ट्र) सर्वाधिकार सुरक्षित मुल्य ; २० रू०

वी० निं० सं० २५०३ ] चि० सं० २०३४ [ ६० सत्‌ १५७७

प्रकाशक

श्रीमान्‌ सेठ छालचंद हीराचंद अध्यक्ष--जैच संस्कृति संरक्षक संघ सोलापूर (सोराष्ट्र

वीर संवत्‌ २५०३ ई० सत्‌ १९७७

प्रथमावृत्ति प्रति ५००

मुद्रक

वद्धंमान मुद्रणालय

जवाहर नगर कॉलोनी, दुर्गाकुण्ड, वाराणसी-२२१००१

स्व. त्र. जीवराज गौतमचंद दोशी स्व. रो. वा. १६-१-५७ (पौप शु. १५)

श्री जीवग॒ज जैन ग्रंथमालाका परिचय

सोलापुर निवासी स्व० वर जीवराज गौतमचंद दोणी कई दर्षों से उदासीन होकर धर्ष कार्य अपली बुत्ति लगा रहे थे। सन्‌ १०४० में उनको प्रदछ इच्छा हो उठी कि अपनों स्यायो- पाजित संपत्तिका उपयोग विशेषखूपसे धर्म और सम्ताजकी उन्नत्तिके कार्ममें करें। तदनुसार उन्होंने समस्त देशका परिभ्रमण कर जेंस विद्वानोंस साक्षात्‌ और लिखित रूपसे सम्मतिर्शा इस बात्तकी संग्रह कीं, कि कौनसे कार्यमें संपत्तिका उपयोग किया जाय। स्फुट मतसंचय कर लेनेके पश्चात्‌ सत्‌ १५४१ के ग्रीष्मकालसें ब्रह्मचारीजीन सिद्धक्षेत्र गजपंथ ( ताशिक ) के णौततल बाता- वरणमें विद्वात्तोंकी समाज एकत्रित की और ऊहापोहपू्वंक निर्णयके लिए. उक्त विपय प्रस्तुत किया |

बिद्वान्‌ सम्मेलनके फलस्वरूप ब्रह्मचारीजीने जैनसंस्कृत्ति तथा जैनसाहित्यके समस्त अंगोंके संरक्षण, उद्धार और प्रचारके हेतु 'जैन संस्क्षत संरक्षण संघ/ नामक संस्थाकी स्थापना की उसके लिये रु० ३०,००० के दाचकी घोषणा कर दो उत्तकी परिग्रहनिवृत्ति बढ़ती गई सल्‌

१५४४ में उन्होंने लगभग दो छाखकी अपनी संपूर्णसंपत्ति संघको ट्रस्टरूपसे अर्पण की इस संघ- के अंतर्गत 'जीवराज जैन ग्रन्थमाका' हारा प्राचीन प्राकृत-संस्कृत

हिंदी तथा मराठी पुस्तकोंका प्रकाशन हो रहा है आजतक इस प्रन्यमाछाते हिंदी विभागमें २५ पुस्तकें, कन्‍्नड विभागमें पुस्तकें, त्तथा मराठी विभागमें ४४ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है

अस्तुत प्रत््य इस ग्रन्थमालाका हिंदी विभागका २० वाँ पुष्प है।

प्रधान सम्पादकीय

श्री जीवराज ग्रत्थमालाके मानद मंत्री श्री सेठ बालूचन्द देवचन्द शाह एक कुशल कर्मेंठ कार्यकर्ता होनेके साथ ही एक दक्ष विचारक भी हैं। उन्हींके विचारमें समस्त श्रावकाचारोंका एक संकलन प्रकाशित करनेकी योजनाका सूत्रपात हुआ और उनके अनन्य सहयोगी तथा जीवराज ग्रन्थमालाके प्रधान सम्पादक डॉ० ए० एन० उपाध्येने कार्यरूपमें परिणत किया प्रकाशित तीन जिल्दोंमें मधिकांश श्रावकाचार पूर्वमें प्रकाशित्त हैं किन्तु उत्तका इस प्रकारका संकलन एकदम अभिनव है। साधारण स्वाध्यायप्रेमी उसका मूल्यांकन नहीं कर सकते किन्तु जो विचारक हैं, अल्वेषक हैं, उतकी हृष्टिमें इस संकलनका मूल्य अत्यधिक है

साधारणत्तया जाठ मूलगुण, पांच अणुब्रत्त, तीन गुणब्रत्त और चार शिक्षाब्रत यह श्रावक- का सर्वेभान्य आचार है। इसके प्रारम्भमें सम्यग्दर्शन और अच्तमें समाधिमरण जोड़नेसे श्रावकधर्म- पूर्ण हो जाता है विक्रमकी तेरह॒वीं शत्तीके ग्रन्थकार पं० आशाधरने अपने सागारघर्मामृतमें कहा भी है--

सम्यक्त्वममरूममलान्यणुगुणशिक्षात्रत्तानि मरणान्ते | सल्लेखना विधित्ना पूर्ण: सागारधर्मोश्यस्‌ (११२)

निर्मल सम्यवत्व, निर्मल अणुत्रत गुणब्रत शिक्षात्रत और मरणकालूमें विधिपृंक सल्ले- खना यह पूर्ण श्रावकाचार है ।!

अत्त: प्रायः सभी श्रावकाचारोंमें इस श्रावक घर्मका वर्णन होने पर भी उसके निरूपणकी पड़तिमें, अन्य प्रासंगिक कथन, तथा देशकालके प्रभावके कारण भनेक विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती हैं और संशोधकोंके लिए वे महत्त्वपूर्ण हैं। प्रत्येक ग्रस्थकार केवल पूर्व॑कथनको ही नहीं दोहराता है। यदि वे ऐसा करें तो उनकी रचनाका कोई महत्व ही रहे पूर्व कथत्को अपना- कर भो वे उसमें अपना वैशिष्ट्य भी प्रदर्शित करते हैं जिससे प्रवाह रूपसे आगत सिद्धास्तोंका

संरक्षण होनेके साथ उसे प्रगति भी मिलती है और थे अधिक लोकप्रिय भी होते हैँ। समस्त श्रावकाचारोंका तुलनात्मक अध्ययन करनेसे उक्त कथनकी पुष्टि होती है प्रत्येककी अपनी- अपनी विशेषत्ताएँ है। यथा--

१. कुछ क्ावकाचारोंको विशेषताएँ

१. रत्नकरण्ड श्रावकाचा रके प्रारम्भके चालीस पद्योंमें सम्यवत्वके माहात्म्यका जंसा वर्णन हैं वैसा अन्य किसी श्रावकाचारसमें नहीं है

२. पुरुषाथंसिद्धयुपायका तो प्रारम्भ ही अनेक वैशिष्ट्योंको लिये हुए हैं। वह समयसा र- के टीकाकार आचार्य अमृतचन्द्रकी कृति होनेसे उसके प्रारम्भमें ही निश्चय और व्यवहारको क्रमश: भतार्थ और अभतार्थ कहा है। और कहा है कि अनजानको जानकारी करानेके लिए

5 व्यवहारका उपदेश देते हैं। जो केवल व्यवहारको ही जानता है वह उपदेशका पात्र है |

श्रावकाचा र-संग्रह्‌

अन्य किसी सी श्रावकाचारमें निश्चय और व्यवहारकी चर्चा नहीं है इसी तरह अच्तमें जो रत्नत्रयके एकदेशकों भी कमंवन्धका कारण मानकर मोक्षका ही उपाय कहा है, सैद्धान्तिक हृष्टिसे वह चर्चा भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। अन्य श्रावकाचारोंमें उसके दशंन नहीं होते | इलोक २११से २२० तक यही चर्चा है। इलोक २११का अर्थ प्रारम्भसे ही भ्रमपूर्ण रहा हैं। भौर गतानुगतिकावश्ष इस संग्रहमें भी वही अर्थ किया गया है। वह इछोक इस प्रकार है--

असमग्ग्न॑ भावयत्तों रत्वन्नयमस्ति कर्म॑वन्धों यः | से विपक्षकृतोडबश्यं मोक्षोपायो बन्धनोपाय: २११॥

भर्थ--अपूर्ण रत्लन्नयधमंको धारण करनेवाले पुरुषके जो कर्मबन्ध होता वह विपक्षी राग- कृत है, रत्तत्रयक्ृत्त नहीं है !'

ऊपरका अर्थ इलोकके तीन चरणोंका है और ठोक है उसमें कोई विवाद नहीं है। किन्तु उसे जो चतुर्थ चरणसे सम्बद्ध करके अर्थ किया गया है वह यथार्थ नहीं है। लिखा है--

'अतः बह परम्परया मोक्षका उपाय है, कमंवन्धनका उपाय नहीं है ।' जरा इस अत्तः' पर ध्यान दें वह कर्मवन्ध रागक्ृत्त है अत्तः मोक्षका उपाय है। और यदि वह वन्ध रत्तत्रयक्ृत होता तो क्या वह मोक्षका उपाय होता ? अपूर्ण रत्नत्रयको धारण करने पर होनेवाला कर्म- बन्ध यतः रागकृत है अत्त: मोक्षका उपाय है यह विचित्र तक है। असलमें चतुथे चरण स्वत्तन्त्र हैं। वह कर्मवन्‍्ध रागक्ृत क्‍यों है? रत्नत्रयक्ृत क्‍यों नहीं है, इसके समर्थनमें युक्ति देता है-- मोक्षका उपाय वन्धनका उपाय नहीं होता अर्थात्‌ भपूर्ण रत्लत्रय मोक्षका उपाय है, वन्धनका उपाय नहीं है। इसीसे अपूर्ण रत्नतयधर्मको धारण करनेवाले पुरुषके जो कमंवन्ध होता है वह रत्नन्नयक्ृत् नहीं है विपक्षी रागकृत है। इसीके समर्थन्में आगेका कथन किया गया है कि जितने अंशमें सम्यग्द्शन, सम्यस्ज्ञान, सम्यकचारित्र है उतने अंशमें वन्ध नहीं है और जितने अंशमें राग है उतने अंशमें वच्च है | अन्तमें ग्रन्थकार कहते हैं--

रत्लत्नयमिह हेतुनिर्वाणस्यैव भवति नान्यस्य भआखवत्ति यत्तु पुण्य शुभीपयोगोध्यमपराध: ॥२२०॥ अर्थ--इस लोकमें रत्नत्रय तो निर्वाणका ही कारण है। अन्यका नहीं | किन्तु रत्लन्नय ' घारक मुनियोंके जो पुण्यवन्ध होता है वह उसके शुभोपयोगका अपराध है। जो आचार्य पुण्यवन्धको शुभोपथोगका अपराध कहते हैं वहू उसे परम्परासे मोक्षका कारण कैसे कह सकते हैं ? अपने तत्त्वार्थतारमें वह लिखते हैं-- देतुकार्यविशेषाभ्यां विशेष: पुण्यपापयो: हेतु शुभाशुभो भावी कार्ये चेव सुखासुले ॥१०३॥ संसारकारणत्वस्य द्योरप्यविशेषतः | ने नाम निद्चयेनास्ति विशेष: पुण्यपापयो: ॥१०४॥। --आख्रवाधिकार |

अर्थ--हैतु और कार्यकी विशेषतासे पुण्य और पापमें भेद हैं। पुण्यका हैतु शुभभाव है और पापका हेतु अशुभ भाव है। पुण्यका कार्य सुख है और पापका अयथ दुःख है। किन्तु दोनों

प्रधान सम्पादकीय हे

ही संसारके कारण होनेसे दोचोंमें कोई भेद नहीं है। अतः निरचयसे पुण्य और पापमें कोई भेद नहीं है लव

अत्त: पण्यबन्धकों परम्परासे मोक्षका कारण त् नहीं कहा | प्राकृत भाव- संग्रहमें देवसेलाचाय॑ ने सम्यस्हृष्टिके निदानरहित पृण्यको परम्परासे मोक्षका कारण अवश्य कहा है -

सम्मादिद्वीपुण्णं होइ संसारकारणं णियमा | मोकखस्स होइ हेउ जइवि निदाणं सो कुणई ॥४०४॥

अर्थ--सम्यग्हृष्टीका पुण्य नियमसे संसारका कारण नहीं होता, मोक्षका कारण होता है यदि वह निदान नहीं करता रे

इससे पूर्वमें उन्होंने जो कहा है वह प्रत्येक श्रावकके लिए ध्यान देने योग्य है। उन्होंने कहा है---

जब त्तक मनुष्य घरका त्याग नहीं करता तब तक पापोंका परिहार नहीं कर सकता। और जव तक पापोंका परिहार नहीं होता त्व तक पुण्यके कारणोंको नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि पुण्यके कारणोंको छोड़कर पापके कारणोंका परिहार करनेवाला पापसे वन्धत्ता रहता है और फिर मरकर दुर्गंतिको जाता है। हाँ, वह पुरुष पुण्यके कारणोंको छोड़ सकता है जिसने अपना चित्त विषय-कषायोंमें प्रवृत्त होनेसे रोक लिया है और प्रमादको नष्ट कर दिया है जो पुरुष गृह-व्यापारसे विरत है, जिसने जिन लिंग धारण कर लिया है और जो प्रमादसे रहित है उस पुरुषको सदा पृण्यके कारणोंसे दूर रहना चाहिए ॥३०३-२९६॥ इस तरह पुण्य सबंथा हेय है और सर्वथा उपादेय है किच्तु सम्यग्हष्टी पुण्यवन्चका अनुरागी नहीं होता, वह उसे संसार- का कारण होनेसे हेय ही मानत्ता है

इस सम्बन्धमें कार्तिकेयानुप्रेक्षाके अन्तर्गत धर्मानुप्रेक्षामें जो कथन किया है वह्‌ भी उल्लेख- नीय है उसमें कहा है --

जो पुरुष पुण्यको चाहता है वह संसारको ही चाहता है; क्योंकि पुण्य सुगत्तिके बन्धका कारण है और मोक्ष पुण्यके क्षयसे मिलता है। जो कषायसहित होकर विषयसूखकी तृष्णासे पुण्यकी अभिलाषा करता है, उसके विशुद्धि दूर है और पुण्यवन्धका कारण विशुद्धि है। पुण्यकी चाहसे पुण्यवन्ध नहीं होता और जो पुण्यकी इच्छा नहीं रखता, उसके पुण्यवन्ध होता है ऐसा जानकर हे यतीइ्वरों ! पुण्यमें भी आदर मत करो मन्द कपषायवाला जीव पुण्यवन्ध करता हैं। अत्तः पुण्यवन्धका कारण मन्दकषाय है, पुण्यकी चाह नहीं है ॥४०९-४१२॥

इस प्रकार विविध अ्न्थोंमें एक ही विषयको लेकर जो विवेचन मिलता है वह सब ज्ञात्तव्य है और यही उन ग्रन्थोंकी विशेषत्ता है।

३. यशस्तिलक चम्पूके अन्तमें जो श्रावकाचार है उसमें अपनेसे पूर्वके श्रावकाचारोंसे अनेक विशेषताएँ हैं। प्रारम्भमें

र0भर्में ही सम्यकत्वके वर्णनमें छोक-प्रचलित मृढतताओंका निषेध करते हुए गायकी पूजा, ग्रहणमें दान, आदिका खुलकर निषेध

गं किया गया है। जाठो अंगोंमें प्रसिद्ध पृरुषोंकी कथाएँ दी हैं पाँच अणुत्रत और मद्यत्याग आदि करनेवालों की सी कथाएँ हैं अन्य

१० भ्रावकालार-संग्रह

उल्लेखनीय विश्वेषताओंमें से एक है ताम्ायिक शिक्षाव्रतके अन्तगंत देवपुजाका विस्तृत वर्णन उसामें सर्वप्रथम पृजनके दो प्रकार मिलते हैं--अत्तदाकार और तदाकार | अतदाकार पुजनके अन्तगंत भक्तियाँ वर्णित हुं--दर्शन ज्ञान चारित्र भक्ति, अहंत्‌ सिद्ध आचाय॑ और चैत्य भक्ति थादि। किन्तु तदाकार पूजनकै अन्तर्गत वह सब वर्णित है जिसपरसे आजकी पृजा पद्धति प्रच- लित हुई है। इसमें ही सर्वप्रथम विविध फछोंके रसोंसे जित प्रत्तिमाके अभिषेकका विधान है तथा ध्यानका वर्णन भी सर्वप्रथम इसी श्रावकाचारमें मिलता है | अन्य भी अनेक विशेषताएँ हैं।

४. अमितगतिका श्रावकाचार उक्त सब श्ावकाबारोंसे बृहत्काय है। उसमें पद्रह परिच्छेद हैं। उसकी रचना यशस्तिलकचम्पूके अन्तर्गत श्रावकाचारसे कुछ ही वर्षेके पश्चात्‌ हुई है ।.दोनों ही श्रावकाबार विक्रमकी ध्यारहवीं शतताव्दीमें रचे गये हैँ। एक उसके पूर्वाधंकी रचना है तो दूसरी उत्तरार्ध की

प्रारमभके चार परिच्छेदोंपें भमित्तगतिने मिथ्यात्वकी वुराईके साथ सम्यक्लकी उत्पत्तिका कथन विस्तारसे किया है जो प्रायः करणानुयोगके ग्रन्थोंमें मिलता है। दूसरा परिच्छेद इसीसे पर्ण हुआ है। उसे पढ़कर सम्यक्त्वकी उत्पत्ति और उसके भेदोंकी जावकारी भलीभाँति हो जाती है | तीसरे परिच्छेदमें सम्यक्वके विषयभुत जीवादि सात तस्‍्वोंका विवेचन है। इसमें जीवके भेद, योनि, आदिक कथ्लपूर्वक चौदह मार्गणा और चोदह गृणस्थानोंके भी नामोंका उल्लेख है। अजीवादित्तत्वोंके वर्णनमें तत्त्वा्थसृत्रके अध्याय ५, ६, ७, ८, "का सार दे दिया है। चतुर्थ- परिच्छेंदममं चावकिका खण्ड करते हुए आत्मा तथा सर्वज्ञतताकी सिद्धि तथा ईइ्बरके जगतक्वृुत- का खण्डत किया गया है। इस प्रकार इस श्रावकाचारके भारम्भके चार परिच्छेदोंमें करणा- नुयोग बव्यानुयोग और स्थायशास्त्से सम्बद्ध आावह्यक विपयोंकी चर्चा करनेके पश्चात्‌ पाँचवें परि- चहेदसे थ्रावकाचारका कथन प्रारम्भ होता है। इसके सातवें परिच्छेदमें बरतोंके अत्तीचारोंका वर्णन करनेके पश्चात्‌ तीन शल्योंका वर्णन करते हुए निदान नामक शल्मके दो भेद किये हैं- प्रशस्त और अप्रदास्त | तथा प्रशस्त निदानके, भी दो मेद कहे हैं--एक मुक्तिका निमित्त और एक संसारका निमित्त। जो कपायरहित पृरुषकर्मोका विनाश, सांप्षारिक ढुःखोकी हानि, बोधि, समाधि भादिको चाहता है उसका निदान मुक्तिका कारण है, और जिसवर्मफी सिद्धिक लिए

उत्तमजात्ति, उत्तमकुल, वन्धुवान्धवोंसे रहितता और दरिद्तताकों भी चाहनेवाले पुरुषका निदान संसारका कारण है। यह सब विशेष कथन पूर्वेके थ्रावकांचारोंमें नहीं हैं

अष्टम परिच्छेदमें छह आवश्यकोंका वर्णन है। ये छह आवश्यक बहो हैं जो मुनियोंक बट्ठाईंस मूल गुणोंमें गभित हैँ। वे हैं--सामायिक, स्तवन, वन्दना, प्रतिक्रमण, प्रत्माख्यान, कायोलर्ग | प्रादीवकालूमें श्रावकके लिए भी यही पडावश्यक थे इन्हींके स्थानमें उत्तरकाठमें देवपूजा, गृरूपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान ये पडावश्यक निर्धारित किये गये। आाजकां धावक तो प्राचीन पड़ावश्यकोंके तामोंको भी भूल गया है। इत पडावश्यकोंके पश्चात्‌ नवभ अध्यायमें दान, शीक उपयास और पूजाका कथन है जो वर्त॑मानमें प्रचलित हैं। दसवें थादि अध्यायोंमें पात्र और दानके प्रकारोंका विस्तारसे वर्णन है

बारहवें कषध्यावमें जिनपूजाका वर्णन है। उसके दो भेद हैं--अव्यपुजा और भावपुजा | वचन और गरीरकों जिनभक्तिम लगाना द्रव्यपुजा है और मनको लगाना भावपुजा है। अथवा

प्रधान सम्पादकीय ११

गन्ध, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप, अक्षेत्त आदिसे जिनपूजा करना द्रव्यप्रजा है और मनको है उसमें लगाना 'भावपूजा है पूजाके ये प्रकार भी पूर्व श्रावकाचारोंमें नहों हैं झ्सी अध्यायमें आगे सप्त व्यसनके दोष और मौनके गुण वर्णित हैं। तेरहवेंमें विनय आदि त्तपोंका, चौदहवेंमें वारह भाव- नाओंका और पन्द्रहवेंमें ध्यानका विस्तृत वर्णन है ॥॒

इस त्तरह ये श्रावकाचार, विविध विपयोंके वर्णनकी इृष्टिसे, विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। मुनि- जन भी इसके स्वाध्यायसे लाभान्वित हो सकते हैं

५. इसके पछचात्‌ वसुनन्दी श्रावकाचार प्राकृत गाथाओंमें रचा गया हैं। यह श्लावकाचार भी कई दृष्टियोंसे विशेष महत्त्वपूर्ण है। इसमें जो ग्यारह॒वीं प्रतिमाका वर्णन है वह अपना विशेष स्थान रखता है इसमें उसके दो भेद किये हैं एक वस्त्रधारी और दूसरा क्रीपीनमात्रधारी आगे इन दोनोंकी चर्या भी वत्तलायी है अमितगतिकी तरह इसमें भी ग्यारह प्रतिमाके पश्चात्‌ विनय, वैयावबुत्य और ब्रत्तोंका वर्णन है। तत्पश्चात्त पूजाका वर्णन करते हुए लिखा है---हण्डावसविणी- कालमें असद्भाव स्थापना या अत्तदाकार स्थापना रूप पूजा नहीं करना चाहिए। आगे संक्षेपमें प्रतिमा-प्रत्तिष्ठा विधान भी है

इसमें द्रव्यपूजाके त्तीन भेद किये हैं--सचित्त अचित्त और मिश्र | प्रत्यक्ष उपस्थित जिन भगवान्‌ और गुरु आदिकी पूजा सचित्त पूजा है। उनके शरीरकी और द्रव्यश्षुत (शास्त्र) की पूजा अचित्त पूजा है | और दोनोंकी पूजा मिश्र पूजा है।

आगे पूजाका फल वर्णन करते हुए कहा है--जो मनुष्य धनियेके पत्तेके बरावर जिनभवन बनाकर उसमें सरसोंके बराबर भी जिन प्रतिमा स्थापित करता है वह तीर्थद्धूर पद पानेके योग्य पुण्यवन्ध करता है

भाचाय॑ अमितगत्तिने अपने सुभाषितरत्वसन्दोहमें भी ऐसा ही कहा है, उसीका अनुसरण वसुनन्दीने किया है। ६. उक्त श्रावकाचारोंके पश्चात्‌ विक्रमकी तेरहवीं शत्ताव्दीमें पं० आाशाधरने अपने धर्मा- मृतके दूसरे भागके रूपसें सागारधर्मामृतकी रचना की और उसपर भव्य कुमुद्चन्द्रिका टीका ओऔर ज्ञानदीपिका पंजिका रची आशाधर एक बहुश्नुत्त विद्वान थे। उन्होंने अपने समयमें उप- लव्घ समग्र साहित्यका अवलोकन किया था। उनकी टीकाओंमें जो पूर्वग्रन्थोंके उद्धरण पाये जाते हैं उनसे इसका समर्थन होता है। उन्तका सागारघर्मामृत पूर्व श्रावकाचारोंका निःस्यन्द जैसा है | वह बहुत्त व्यवस्थित है उसीमें प्रथम वार स्पष्ट रूपसे श्रावकके पाक्षिक, नैष्ठिक और साधक भेद मिलते हैं जो महापुराणमें वर्णित पक्ष, चर्या और साधन पर प्रतिष्ठित हैं। दूसरे अध्यायमें पाक्षिकका, आठवेंमें साधकका और मध्यके शेष अध्यायोंमें नैष्ठिकका वर्णन है विशेषताकी हृष्टिसे प्रथम दो बध्याय त्तथा छठा अध्याय उल्लेखनीय है | प्रथम अध्यायमें श्रावकृधर्मका पारून करनेके लिये कौत अधिकारी है, यह विशेष कथत्त है त्तथा छठें अध्यायमें श्रावककी दिनचर्याका वर्णन है किसी भी अन्य श्रावकाचा रमें यह कथन नहीं है, हाँ, श्वेताम्व॒राचार्य हेमचन्द्रके योगशास्त्रमें यह्‌ सब कथन है। सागारघर्मामृत्तकी कई अन्य चर्चाओंपर भी योगशास्त्रका प्रभाव है| दूसरे अध्याय- में पाक्षिक श्रावकका कथन विस्तारसे है जिसे जैन्धमंका पक्ष है वह पाक्षिक है। आजका जैन समाज श्रायः पाक्षिक की ही श्रेणीमें आता है पाक्षिकको जिनदेवके वचन्तोंपर श्रद्धा रखते हुए भृद्य मांस सधु और पाँच उद्म्वर फलोंके सेवनका त्याग करना चाहिए। रात्रिमें केवल मुखको

श्र श्रावकाचार-संभ्रह

सुवासित करनेवाले पान, इलायची, जल औषधिके सिवाय अन्य सब नहीं खाना चाहिए। पानी छानकर उपयोगमें लाना चाहिए। जिनपुजन करना चाहिए। श्रद्धा और शक्तिके अनुरूप जिना- लय, स्वाध्यायशाला, औषधालय, भूखोंके लिए भोजनालय आदि बनवाना चाहिए। जो नामसे या स्थापनासे भी जेन है वह पात्र है उसकी सहायता करनी चाहिए तथा अपनी कन्याका विवाह साधर्मके साथ ही करना चाहिए। मुनियोंकों गुणवान बनानेका प्रयत्न करना चाहिए। यह सब उपदेश आजके श्रावकोके लिए बहुत ही उपयोगी है। श्रावकके ब्रतसम्वस्धी आचारका वर्णन तो सभी श्रावकाचारोंमें है किन्तु उन्हें अपना जीवनयापत्त केसे करना चाहिए, गाहँस्थिक विवाह्दि कार्य क्रिस प्रकार करना चाहिए, कन्यादान किसे करना चाहिए, साधमियोंके प्रति क्या करना चाहिए, यह सब कथन इससे पृव॑के श्रावकाचारोंमें नहीं है ! हिन्दू धर्मेशास्त्रके विविध विषयोंमें बर्णोके कत्तव्य, उनकी अयोग्यता, संस्कार, उपनयन, आश्रम, बिवाह, भोजन, दान, वानप्रस्थ, संन्यास और तोर्थयात्रादि भी हैं तथा उत्तराधिकार आदि भी हैं। ये सब क्रियाएँ गृहस्थोंके देलंदिन कतंव्योंसे सम्बद्ध है। पं* आज्याधरजीने अपने सागारधर्मामृतमें प्रायः इस सभीको लिया है। धर्ममें वणॉका अधिकार वतलाते हुए बह कहते हैं--

जिसका उपनय संस्कार हुआ है बहू द्विज-बन्राह्मण, क्षत्रिय या वेश्य सम्यवत्वसे विशुद्ध- वृद्धि होनेपर जीवनपर्यल्तके लिए मद्यपाच आदि महापापोंका त्याग करनेपर बीतराग सर्वज्ञ देवके हारा उपदिष्ट उपासकाध्ययन आदिके श्रवण करनेका अधिकारी होता है (२१९) तथा शुद्र भी आसन आदि उपकरण, मद्य आादिका त्याग और शरीरकी शुद्धिसे विशिष्ट होनेपर जिनधर्मके श्रवणका अधिकारी होता है क्योंकि वर्णते हीन होतेपर भी आत्मा काललब्धि आनेपर आर्थात्‌ धर्माराधनकी योग्यता होनेपर श्रावकधर्मका आराधक होता है (१२२) |

पं० आशावरजी ने अपने अनगारधर्मामृत (४|१६७) में एपणा समितिका स्वरूप बतलाते हुए कहा है कि विधिपूर्वक अन्यके द्वारा दिये गये भोजनको साधु ग्रहण करता है | अपनी टीका- में उन्होंने अन्ये:' का अर्थ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैद्य और सत्‌ शूद्ध किया है इसका मतलव यह हुआ कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वेश्यकी तरह सत्‌ शूद्र भी आहारदान दे सकता है।

आशावरजी से पूर्वेवर्ती आचार्य सोमदेवने भी अपने उपासकाध्ययनमें कहा है--

दीक्षायोग्यास्त्रयो वर्णाइचत्वारश्च विधोचिता: मनोवावकाय्रधर्माय मता: सर्वेष्पि जन्तबः ॥७९१॥ अर्थात्‌ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ये त्तीन वर्ण दीक्षाके योग्य हैं किन्तु भाहा रदानके योग्य चारो हैं; क्योंकि सभी प्राणियोंको मानसिक, वाचनिक और कायिक धर्म पालनेकी अनुमति है। इन्हीं सोमदेव आचार्य॑ने अपने नीतिवाक्यामृतमें एक वार विवाह करनेवालेको सत्तृ शूद्र कहा है। वही आहारदानका अधिकारी है। आगे उन्होंने छिखा है-- कट 'आचारानवद्यल्व॑ शुचिसुपस्कर: शारीरी विशुद्धि: करोति शूद्रमपि देवहिजतपस्वीक्मसु ग्यम्‌ ॥१श॥'

अर्थात्‌ आचारकी निर्दोपता, घर और उपकरणोंकी पवित्रता तथा धारीरिक विशुद्धि शृद्र- को भी देव, द्विज ओर तपस्वी जनोंके परिकर्मके योग्य वमाती है

६. प्रधान सम्पादकीय १३

आचार्य सोमदेवका ही अनुसरण आशाघरने किया है। आजकल एक नया जे रे +र दिया गया है कि मद्य मांस मधु आदि अष्टमूल गुणके धारण कि कक 8 2 शुद्ध होती है अर्थात्‌ मद्यादिका सेवन मिथ्यात्वके सेवनसे भी बड़ा पाप है है के अडी हो वेरुद्ध है आगममें मिथ्यात्वको ही महापाप कहा है। मिथ्यालरके उदयमें अष् लग करनेपर भो संसारका अन्त नहीं होता और मिथ्यावका उदय जाते 2588 रे नकट हो जाता है भत्तः शुद्धवुद्धि होकर ही अष्ट मूलगुण धारण करना यथार्थ है। कह से नहीं निकालना चाहिए कि मद्यादिका सेवत उचित है या उनका त्याग अनुचित 33 28% तो हर हालतमें त्याज्य ही है किन्तु मिथ्यात्वके उदयमें उनके त्यागने मात्रसे से 5 होती वह होत्ती है सम्यक्त्व धारण करनेसे | प॑० आश्ाधरजीने उक्त इलोककी टीकामें 'शुद्धवी: का अर्थ 'सम्यक्त्व विशुद्ध वुद्धि' ही किया है। | अतः 'भहापापोंकों छोड़कर विशुद्ध बुद्धि हो गई है जिसकी" ऐसा अर्थ गलत है| किन्तु सम्यकत्व विशुद्ध बुद्धि महापापोंको जोवनपर्यस्त छोड़कर जिनधर्मके श्रवणका अधिकारी होता है ऐसा अर्थ ही आगमानुकूल है। पुरुषार्थ सिद्धथुपायमें इसी प्रकारका कथन है-- “अष्टावनिष्टदुस्तरदुरित्तायतनान्यमूनि ज्यं ) जिनधर्मंदेशताया भवन्ति पात्राणि शुद्धघियः इसका भी अर्थ “अष्ट मूलगुण घारण कर शुद्ध हुई है 3 बुद्धि जिचकी' गलत है) यहाँ भी कर्ता शुद्धघिय: है। सम्यकत्व विशुद्ध बुद्धि इन आठ अनिष्टोंको त्यागकर जिनधर्मकी देशनाके पात्र होते हैं--यही अर्थ यथाथ है। सभी जैनाचार्यों और ग्रस्थकारोंकी यह विशेषता रहो है कि उन्होंने परम्परागत सिद्धान्त का ही संरक्षण किया है और कहीं भी अपने अभिनिवेशसे उसे बाधा नहीं पहुंचाई है। आश्वाघर जी इस विषयमें अत्यस्त प्रामाणिक रहे हैँ। सर्वत्र उन्होंने पुर्वाचार्योके कथनकी ही यथायोग्य पुष्टि- की है। उदाहरणके लिए शासनदेवत्ताओंको ही छीजिये उन्हें उन्होंने कृदेव ही कहा है। तथा नैप्ठिक श्रावकको विपत्तिग्रस्त होनेपर भी उत्तको सेवा करनेका ही विधान किया है। यथा-- साभारधर्मामृत (३॥७-८)की टीकामें 'परमेष्ठी पदैकधी:” की व्याख्या करते हुए लिखा है कि-- 'विपत्तियोंसे पीड़ित होनेपर भी नैष्ठिक श्रावक शासनदेवताओंको नहीं भजता | पाक्षिक भजता भी है, यह बतलानेके लिए ही 'एक' पद दिया है!'। किसी भी अन्य श्रावकाचारमें इस प्रकारका निषेधपरक कथन नहीं है विधिपरक भी नहीं है सोमदेवाचार्यके ला पर यहे कथत भाता है कि जो श्रावक जिनेन्द्रदेवको और व्यन्तरादिदेवोंको पूजाविधानमें उमान मानता है वह नरकगामी होता है | परमागममें जिनशासतकी रक्षाके लिए उन आस _तत्ताओंकी कल्पता की गई है। अतः पृजाका एक अंश देकर सम्यस्ृष्टियोंको उत्तका सम्मान हा ॥' किन्तु आशाधरजीने इस प्रकारका विधान करके उसका स्पष्ट रुपते विश

पं भाशाधरजीके सागारधर्मामृतकी अनेक विशेषत्ताएँ हैं। थे निश्चय और व्यवहार दोनोंके ही पंडित थे और उन्होंने दोचोंका ही समन्वय क्रनेका प्रयत्त किया हैं। उनके पद्चात्तु

१४ श्रावकाचार-संग्रह

भी अनेक क्रावकाचार रखे गये जिनमेंसे कुछ उनसे प्रभावित्त हैं किन्तु उनके जेसी सच्तुलित आग- मिक हृष्टि उनमें नहीं है मेधावी पण्डित्तका धर्मसंग्रह श्रावकाचार त्तो सागारघर्मामृतकी ही अनुकृत्ति है। इत सब उत्तरकालीन श्रावकाचारोंके तुलनात्मक अध्ययनेसे उत्तरकालीन श्रावक भरमंका यथार्थ रूप सामने भात्ता है और उसमें हुए परिवर्तन स्पष्ट होते हैं

पं० हीराछालजी सिद्धान्तशास्त्री एक परिश्रमशील साहित्यानुरागी आममजन्न विद्वान हैं उन्होंने जेन-साहित्यकी असीम सेवा की है और इस वृद्धावस्थामें भी युवकोंकी तरह कार्य संलग्न हैं। यह उनका ही पुरुषार्थ है जो उपलब्ध समस्त श्रावकाचारोंका संग्रह हिन्दी अनुवाद के साथ प्रकाशमें सक्रा है। उनकी इस साहित्यसेवाका मूल्यांकन भावी पीढ़ी अवश्य ही विशेष रूपसे कर सकेगी। हम तो केवछ उनका अभिनन्दन ही करते हैं

चाराणसी केलाशचन्द शास्त्री

रक्षावन्चन २०२४

सम्पादकीय वक्‍तव्य

श्रावकाचार-संग्रहके छ्वित्तीय भागकें प्रकाशित होनेके एक वर्ष बाद उसका यह तीसरा भाग प्रकाशित हो रहा है। प्रथम भागमें « श्रावकाचार और दूसरेमें श्रावकाचार प्रकाशित्त हुए हैँ। इस त्तीसरे भागमें सब मिलाकर १९ श्रावकाचारोंका संकलन है, जिनमेंसे श्रावकाचार पूर्ण रूपमें स्वतंत्र हैं और शेष ११ विभिन्‍त ग्रन्धोंमेंसे श्रावक धर्मंका वर्णन करनेवाले अंज्षोंको

परिशिष्टमें दिया गया है। इनमेंसे लाटीसंहिताका प्रारंभिक कथामुखवाला भाग अनुपयोगी होनेसे छोड़ दिया गया है

दूसरे भागके सम्पादकीयमें कहा गया था कि तीसरे भागके साथ विस्तृत्त प्रस्तावना दी जायगी, जिसमें संकलित श्रावकाचारोंकी समीक्षाके साथ श्रावकाचारका क्रमिक विकास और उनके कर्ताओंका परिचय भी दिया जायगा | किन्तु यह त्तीसरा भाग प्रारंभ के दोनों भागोंसे भो अधिक पृष्ठोंका हो गया है। यदि इसके साथ प्रस्तावना और इलोकानु क्रमणिका दी जाती त्तो इसका कलेवर इससे दुगुना हो जाता दूसरे यह भी निर्णय किया गया कि जव संस्कृत-प्राकृत्तमें उपलब्ध सभी श्रावकाचारोंका संकलन प्रस्तुत संग्रहमें किया गया है तो हिन्दीमें छत्दोवद्ध क्रिया- कोषोंका संकलन भी क्यों कर लिया जावे, जिससे कि उन अनेक ज्ञातव्य कत्त॑व्योंका वोध भी पाठकोंको हो जायगा, जिनका कि पालन श्रावकोंके लिए भत्यावश्यक है। भत्तः प्रस्तावना पढ़नेके लिए उत्सुक पाठकों और समीक्षकोंको चौथे भागकी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी |

श्रावकाचारकी जो प्रस्तावना लिखी जा रही है, उसकी कुछ विशेषत्ताएँ इस प्रकार हैं-- १. सभी श्रावकाचा रोंके रचयित्ताओंका कालक्रमसे परिचय |

२. प्रत्येक श्रावकाचारकी विशेषताका दिग्दर्शन |

३. मूल गुणों एवं उत्तर गुणोंके वर्णनगत मत-भेद, उसका कारण और क्रमिक विकास ! ४. पूजन विधिका क्रसिक विकाप्त, ध्यान, जप, मंडल, ब्रत्तादिपर विशद प्रकाश |

५. अत्तीचारोंका रहस्य

६. प्रतिमाओंका उद्देश्य और दवेत्ताम्वर श्ास्त्रोंके साथ तुलना

७. निदानके भेद-प्रभेद और इवे० शास्त्र-गत विशिष्टता |

<. भक्ष्य पदार्थोकी कालू-मर्यादा

९. वत्तमानमें जैच् या पाक्षिक श्रावकके न्यूनतम कतंव्य आदि |

इसी प्रकार परिशिष्टमें इलोकानुक्रमणिकाके सिवाय अनेक उपयोगी विभाग रहेंगे | इस भागके साथ तीचतों भागोंका शुद्धि-पत्रक भी दियाजा रहा न्सं असावधान्रीसे २-३ भद्दी भूलें भी रह गई हैं, जिचका उल्लेख हा है। प्रूफ-संशोधककी

शुद्धि-पत्नकके प्रारम्भमें कर दिया गया है। पाठकगण उन्हें यथास्थान सुधारकर पढ़नेकी कृपा करें |

१६ श्रावकाचा र-संग्रह

प्रस्तुत भागके सम्पादनमें ग्रन्थ-मालाके प्रधान सम्पादक श्रीमान्‌ पं० केलाबचद्वणी सिद्धान्ताचार्य, वाराणसीका भर-पुर परामश-सहयोग रहा हैं। श्री प॑० महादेवजी व्याकरणाचार्य- ने पूरव॑बत्‌ ही प्रुफ-संशोधन किया है और वर्धमान मुद्रणालयमें इसका मुद्रण हुआ है, इसलिए में सबका भाभारी हूँ

तमें संस्थाके मानद मंत्री श्रीमान्‌ सेठ वालचन्द्र देवचन्द्र शह्यका किन शब्दीमें आभार

व्यक्त करू जो कि इस जीवराज ग्रन्थमालाके सिवाय धन्य अनेक संस्थाओंका संचालन ८४ वर्ष की अवस्थामें भी नौजवानोंके समान स्फूतिके साथ कर रहे हैं। उनके प्रोत्साहन-भरे पत्रींसे मुझे सदा ही प्रेरणा मिलती रहत्ती है

ऐ० पन्‍्तालाल दि. जैन --ही रालाल सिद्धान्तशास्त्री

सरस्वती भवन, व्यावर

२५] | ७७

श्रावकाचार-संग्रह तृतीय भागकी

पविषय-सूची

१७. लाटीसंहिता धर्मका स्वरूप और ब्रतका लक्षण श्रावकोंकी तिरेपन क्रियाओंका वर्णन दर्शनिक श्रावकका स्वरूप दर्शत्तिक श्रावकको अष्ट्मूलगुण घारण करनेका उपदेदा तथा चर्मपात्रगत्त घृत तैल आदिके त्यागनेका विधान खाद्य स्वाद्य आदि भक्ष्य पदार्थोको शोधकर खानेका उपदेश साग्-भाजी भादिके ग्रहण करनेका निषेध रात्रि-भोजन-त्यागका विधान दही छाछ आदिके मर्यादासे वाहिर खानेका विधान मदिरा, भांग, अफीम आदिके सेवनका निषेध मधु-त्यागका उपदेश उदुम्बर फछोंके त्यागका उपदेश कंदमूल आदि साधारण वनस्पत्ति भक्षणका निषेध सप्त व्यसन त्यागका उपदेद सम्यवत्वकी दुर्लभता और महत्ताका वर्णन सम्यग्दरशंनका स्वरूप और उसके निरचय तथा व्यवहार सम्यकत्वीके प्रद्यम संवेग आदि गुणोंका सथुक्तिक वर्णन भक्ति वात्सल्य आदि गुणोंका विशद निरूपण कुलाचार क्रियाका ब्रत रूपसे पालत करनेपर ही पंचम गुण स्थानवर्ती दार्शनिक संज्ञा होती है, अन्यथा नहीं सम्यग्दर्शतके आठ अंगोंका विस्तृत्त वर्णन निःशंकित अंगका विस्तृत विवेचन सप्त भयों का वर्णन निःकांक्षित अंगका वर्णन तिविचिकित्सा अंगका वर्णन अमूढ इृष्टि अंगका वर्णन सत्यार्थ देवका स्वरूप निरूपण्‌ सत्याथे गुरुका िरूएगा

पृष्ठ-संख्या १--१५१

48

7) ११ १७ ३० ३१ श्ट ४१

फपु० ५३ ५्छ ५९ ६० घर द्दरे

१८ प्रावकाचार-संग्रह

सागार और अत्तगार धर्मका निर्देश

उपवृंहण अंगका वर्णन

स्थितिकरण अंगका स्वरूप

वात्सल्य अंगका वर्णन

प्रभावना अंगका वर्णन

श्रावकब्रत्तोंक धारण करने योग्य पुरुपका निरूपण

यद्यपि सम्यवत्वी पुरुषका व्रत-ग्रहण मोक्षके लिए होता है, तथापि सम्यवत्वी, मिथ्यात्वी, भव्य और अभव्यको भी ब्रत्त धारण करनेका उपदेश

पुण्य क्रियाओंके करनेका उपदेश

भणुब्रत्त और महाब्रतका स्वरूप

हिंसा पापका निरूपण

एकेन्द्रियादि जीवोंका विस्तृत विवेचन

प्रमत्तयोगी सदा हिसक है, अप्रमत्तयोगी नहीं

अणुक्नतधा रीको चरसाहिसावाली क्रियाओंका त्याग आवश्यक है

व्रतके यम्म और नियम रूप भेदोंका वर्णन

महारम्भ रूप कृषि, बाणिज्य आदि कार्योके त्यायका उपदेश

ब्रतरक्षार्थ भावनाओंके करनेका उपदेश

श्रावककी यथासम्भव ईर्या आदि समित्तियोंके पालन करनेका उपदेश

भोजनके समय श्रावकको हिंसा पापकी निवृत्तिके लिए यथासम्भव अन्तरायोंके पालन करनेका तथा द्विदल अन्न आदि खानेका निषेध

एपणाशुद्धिके लिए सूतक-पातक आदि पाछतका निर्देश

भहिसाणुक्रतके अत्तिचारोंका निरूपण

सत्याणुक्रतवका निरूपण

सत्यत्नरतकी भावनाओंका निरूपण

सत्याणुव्रत्के अत्तिचारोंका मिरूपण

अचीौर्याणुन्नतके स्वरूपका वर्णन

अचौर्याणुव्रतकी भावनाओंका निरूपण

अचौर्याणुत्रतके अतिचारोंका निरूपण

ब्रह्मचर्याणुश्नतका निरूपण

ब्रह्मचर्याणु्नतकी भावनाओंका वर्णन

ब्रह्मचर्याणुत्रतके अतिचार

परिग्रहपरिमाण अणुब्रत्तका स्वरूप

परिग्रहपरिमाण त्रतकी भावनाओंका निरूपण

परिग्रहपरिमाण ब्रतके अतिचारोंका वर्णन

दिग्विरति गुण ब्रतका वर्णन

दिग्विरति गुणब्रतके अत्तिचार

७१ ७४ कग

७६

7

७८

८१ ८रे ८४

८५ ९२ ९६

2 ९८

१००

१०२

१०६ १०७ १०८ १६० १११ १६२ ११४ ११५ ११६ ११७ ११९ १२० १२१ श्रर १२३ श्र्ड

बिपय-सूची

देशविरति गुणब्रत्तका स्वरूप निरूपण देशविरत्ति गुणब्रत॒के अतिचारोंका वर्णन अनथेदण्डविरति गूणव्रतका निरूपण अनर्थवण्डविरतिके अतिचारोंका वर्णन सामायिक शिक्षात्त्तका विस्तृत निरूपण सामायिक शिक्षात्रतके अतिचार प्रोषधोपवास शिक्षात्रतका स्वरूप प्रोषधोपवास शिक्षात्रतके अतिचार भोगोपभोग परिमाण शिक्षाक्रतका स्वरूप और उसके अत्तिचार अतिथिसंविभाग शिक्षान्नत्तका स्वकूप अतिथिसंविभाग शिक्षाक्रत्के अतिचार संहलेखनाका विधान और उसके अतिचारोंका निरूपण सामायिक प्रतिमाका स्वरूप वर्णन प्रोषध प्रत्तिमांका स्वरूप वर्णन सचित्त त्याग प्रतिमाका स्वरूप निरूपण रात्रि भक्त परित्याग प्रतिमाका स्वरूप निरूपण ब्रह्मचयें प्रतिमाका स्वरूप निरूपण आरंभ त्याग प्रतिमाका स्वरूप सिरूपण परिग्रह त्याग प्रतिसाका स्वरूप निरूपण भनुमतित्याग प्रत्तिमाका स्वरूप निरूपण उद्दिष्ट भोजन्न त्याग प्रतिमाके दोनों भेदोंका स्वरूप निरूपण ग्यारहवीं प्रतिमावाले वानप्रस्थ आदिका स्वरूप मिरूपण अनशन आदि वारह तपोंका निरूपण १६. उमास्वामि-भ्रावकाचार पूर्वांचाय॑-अणीत क्रावकाचा रोंके अनुसार श्रावकाचार-निरूपणका निर्देश धर्मका स्वरूप, सम्यवत्व और सत्यार्थ देव, गुरुका निरूपण सम्यवत्वके भेद और उसके माहात्म्यका निरूपण सम्यक्त्वके भाठ अंगोंका निरूपण सम्यक्त्वके संवेग, निर्वेद भादि आठ गुणोंका वर्णन फ् सम्यक्लके २५ दोषोंका वर्णन तथा उसके नि्दोप पालनका माहात्म्य कआावकको देवपृजादि पड़ आावश्यकोंके करनेका उपदेश अतिशयवाली व्यंगित्ि प्रत्तिमा की पृज्यता का वर्णन शिरोहीन प्रतिमाको पृजनेका निषे् विभिन्‍न दिश्वाओंमें मुख करके पूजन करनेके फलका वर्णन्‌

१९

१२५ १२६ १२७ १२८ १२९ श्र्३ १३४ ११५ १३६ ११७ श्शे८ट १३९ १४१ १४२ १४२ १४३ १४३ १४४ १४५ १४५ १४६ १४८ १४९ १५२-१९१ १५२ १५२ १५३ श्ष्प्‌ १५८ १५९ १६०

28

१६१

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१६२

१८ श्रावकाचार-संग्रह

सागार और अनगार धर्मका निर्देश

उपबृहण अंगका वर्णन

स्थितिकरण अंगका स्वरूप

वात्सल्य अंगका वर्णन

प्रभावना अंगका वर्णन

श्रावकव्रतोंके धारण करने योग्य पुरुषका निरूपण

यद्यपि सम्यक्‍्त्वी पुरुषका ब्रत-ग्रहण मोक्षके लिए होता है, तथापि सम्यकत्वी, मिथ्यात्वी, भव्य और अभव्यको भी ब्रत धारण करनेका उपदेश

पुण्य क्रियाओंके करनेका उपदेश

अणुक्रत और महाब्रतका स्वरूप

हिंसा पापका निरूपण

एकेन्द्रियादि जीवोंका विस्तृत विवेचन

प्रमत्तयोगी सदा हिंसक है, अप्रमत्तयोगी नहीं

अणुव्रतधा रीकी चसहिसावाली क्रियाओंका त्याग आवद्यक है

ब्रतके यम और नियम रूप भेदोंका वर्णन

महारम्भ रूप कृषि, वाणिज्य आदि कार्योके त्यागका उपदेश

वतरक्षार्थ भावनाओंके करनेका उपदेश

श्रावकको यथासम्भव ईर्या आदि समित्तियोंके पालन करनेका उपदेश

भोजनके समय श्रावकको हिंसा पापकी निवृत्तिके लिए यथासम्भव अन्तरायोंके पालन करतेका तथा ट्विदल अन्न आदि खानेका निषेध

एषणाशुद्धिके लिए सृत्तक-पातक आदि पालनका निर्देश

अहिसाणुब्रतके अतिचारोंका निरूपण

संत्याणुतब्रवका मिरूपण

संत्यव्रत॒की भावनाओंका निरूपण

सत्याणुत्रतके अतिचा रोंका निरूपण

अचौर्याणुब्रतके स्वरूपका वर्णन

अचौर्याणुब्रतकी भावन्ाओंका निरूपण

अचीर्याणुव्रतके अतिचारोंका निरूपण

ब्रह्मचर्याणुश्रतका निरूपण

ब्रह्मचर्याणुन्नतकी भावनाओंका वर्णन

ब्रह्मचर्याणुब्रत्तके अतिचार

परिग्रहपरिमाण अणुक्नत्का स्वरूप

परिग्रहपरिमाण ब्रत्की भावनाओंका निरूपण

परिग्रहपरिभाण व्रतके अतिचारोंका वर्णन

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१११ ११२ १९४ ११५ ११६ ६६१७ ११९ १२० १२१

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विपय-सूची

देशविरत्ि गुणब्रत्तका स्वरूप निरूपण देशविरति गुणब्रतके अतिचारोंका वर्णन अनर्थंदण्डविरति गुणब्रतका निरूपण अनर्थदण्डविरतिके अतिचारोंका वर्णन सामायिक शिक्षात्रत्तका विस्तृत निरूपण सामायिक शिक्षाव्रतके अतिचार प्रोषधोपवास शिक्षात्रतका स्वरूप प्रोषधोपवास शिक्षात्रतके बतिचार भोगोपभोग परिमाण शिक्षान्रतका स्वरूप और उसके अतिचार अतिथिसंविभाग शिक्षात्रत्तका स्वरूप अतिथिसंविभाग शिक्षात्रत्तके अत्तिचार संललेखनाका विधान और उसके अतिचारोंका निरूपण सामायिक प्रतिमाका स्वरूप वर्णन प्रोषध प्रत्तिमाका स्वरूप वर्णन सचित्त त्याग प्रतिमाका स्वरूप निरूपण रात्रि भक्त परित्याग प्रतिमाका स्वरूप निरूपण ब्रह्मचरय प्रतिमाका स्वरूप निरूपण गारंभ त्याग प्रत्तिमाका स्वरूप निरूपण परिग्रह त्याग प्रतिमाका स्वरूप निरूपण अतुमत्तित्याग प्रतिमाका स्वरूप निरूपण उदिष्ट भोजन त्याग प्रतिमाके दोनों भेदोंका स्वरूप निरूपण ग्यारहवीं प्रतिमावाले वानप्रस्थ आदिका स्वरूप निरूपण अनशन आदि बारह तपोंका निरूपण १६. उप्तास्वाप्रि-भ्रावकाचार पूर्वांचाय॑-प्रणीत्त श्रावकाचा रोंके अनुसार श्रावकाचार-निरूपणका निर्देश धर्मका स्वरूप, सम्यवत्व और सत्याथे देव, गुरुका निरूपण | सम्यवत्वके भेद और उसके माहात्म्यका निरूपण सम्यवत्वके आठ अंगोंका निरूपण सम्यक्त्वके संवेग, निर्वेद आदि भाठ गुणोंका वर्णन सम्यकत्वके २५ दोषोंका वर्णन तथा उसके निर्दोप श्रावकको देवपृजादि पड्‌ आवश्यकोंके करनेका उपदे; विभिन्‍न परिसाणवाली प्रतिमाओंके पजन करने शिल्पशास्त्रोक्त लक्षणवाली प्रतिमाकी तथा व्यंगित प्रतिमा की पृज्यता का वर्णन शिरोहीन प्रतिमाको पूजनेका निषेध विभिन्‍न दिशाओंमें मुख करके पूजन करनेके

पाछनका माहात्म्य _

के फलका निरूपण

रनेके फलका वर्णन

१२५ १२६ १२७ १२८ १२९ १३३ १३४ १३५ १३६ १३७ १३८ १३९ १४१ १४२ १४२ (४३ १४३ १४४ १४५ १४५ १४६ १४८ १४९ १५२-१९१ १५२ १५२ १५३ १५५ श्ष्ट १५९ १६०

१६१

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१६२

२० श्रावकाचार-संग्रह

श्रीचन्दन आदि द्रव्योंसे पूजत करनेका विधान १६३ इक्कीस प्रकारवाली पूजाका वर्णन १६४ शान्ति आदि विशिष्ट कार्योके लिए विशिष्ट वर्णके वस्त्र पहिन करके पूजन करनेका विधान हा जिन-पूजन महान पुण्योपाजंनका कारण है 9) आवाहन भादि पंचोपचारी पूजन करनेका विधान १६५ स्पृश्य शुद्रोंके द्वारा ही मन्दिर-निर्माण करानेका विधान पंचामृत्तसे अभिषेक और अष्ट द्वव्योंसे पूजन करनेका विज्ञान १६६ नामादि चार निशक्षेपरूप पूजनका वर्णन १६७ गुरूपास्तिका वर्णन और गुरुका स्वरूप | स्वाध्याय आदि शेष कत॑व्योंका निरूपण १६९ त्तपके १२ भेदोंका वर्णन १७० दानका विस्तृत्त निरूपण ६७१ सम्यग्ज्ञानकी उपासनाका निरूपण १७२ सम्यक्चारित्रकी उपासनाका निरूपण १७३ विकलचारित्रका निरूपण १७४ भद्य, मांस और मधु-भक्षणके त्यागका सयुक्तिक वर्णन तवनीत एवं पंच उदुम्बर फलोंके भक्षणका निषेध १७७ भगालित जल, द्विदल अन्न एवं अथाना आदिके भक्षणका निषेध १७८ रात्रि-भोजनके दोषोंका वर्णन १७९ पंच भणुक्रत्तोंका वर्णन है तीन गुणबत्तों का वर्णन १८४ चार शिक्षाव्तत्तोंका वर्णन १८६ सल्लेखनाका वर्णन १८९ सदा व्यसनोंके त्यागका उपदेश १० वृद्ध पुरुषोंकी सेवा आदि सत्कार्योके करनेका उपदेश छा १७. श्री पुज्यपाद श्रावकाचार : १९२-२०० सत्याथंदेवका स्वरूप १९२ सम्यवत्वका स्वरूप और माहात्म्य-वर्णन अष्ट मूलगुणोंका निरूपण १९३ पंच अणुब्रत्तोंका त्था सप्त शीलब्नत्तोंका निरूपण सर सप्त व्यसनोंके त्यागका एवं कन्दमूलादि अभक्ष्य पदार्थोके भक्षणका निषेध १९४ मौन धारण करने और चतुविध दान देनेका उपदेश १९५

दानके महान्‌ फलका वर्णन १९६

विपयन्सूची २१

जिन-विम्व निर्माण कराके प्रतिदिन पुृजन करनेका उपदेश ११७ पवव॑ दिनोंमें उपवास करनेका उपदेश और फल-विशेपका निरूपए १९८ राजि-भोजन करने और नहीं करनेके फलका वर्णन धर्म-सेवनमें विछम्ब करनेका उपदेश १९९ धर्म-सेवनसे रहित्त मनुष्य मुतकके समान है २०० १८, ब्रतसार श्रावकाचार र०३-२०५ सम्यक्त्व की महत्ता और उसका स्वरूप र्ण्ड अष्ट मूछगुणों का वर्णन रः अभक्ष्य वस्तुओंके भक्षणका निषेध ॥) श्रावकके बारह ब्तोंका निर्देश २०५ पवेके दिनोंमें उपवास करनेका विधात ») पात्रोंकोी दान देनेका, सदा पंच नमस्कार मंत्र स्मरण करनेका एवं प्रतिष्ठा यात्रादि करनेका उपदेश हा १९. ब्रतोद्योतन श्रावकाचार २०६-२६२ प्रात: उठकर शरीर-शुद्धि करके जिन-विम्ब दर्शन एवं पूजन करनेका उपदेश २०६ ऋतुमती स्त्रीके जिन-पुजन करनेका दुष्फल २०७ जीव-रक्षाका विचार करके पीसन्ता-कूटना आदि गुह-कार्य करनेवाली स्पत्रीके दृष्फलोंका वर्णन पे कन्दमूल, पत्र, पुष्पादिके भक्षणका निषेध 4०८ शम-भावके बिना जिन-पूजन, शास्त्र-पठतादि सब व्यथे हैं २०९ दृराचारिणी स्त्री दीघेकाल त्तक संसारमें परिभ्रमण करत्ती है पूर्व भवमें मुनि-निन्‍्दादि करनेवाली स्त्रियोंके नामोंका उल्लेख २१० यत्ति, ऋषि, जनतगार आदिका स्वरूप २११ कुटिल मनोवृत्तिवाला साधु भी भव्यसेनके समान दुःख पाता है हि अभक्ष्य-भक्षण, रात्ि-भोजन, कूट-साक्षी आदिके दुष्फलोंका वर्णन २१२ क्रोधादि कषायोंके फलसे जीव व्याघ्न आदि होता है २१३ पंचेन्द्रियोंके विपयों तथा सप्त व्यसनोंके सेवनके दृष्फलोंका वर्णन है मिश्रमिथ्या हृष्टि पुरुष भी दीघकाल तक संसारमें परिभ्रमण करता है श्१७ तीन दिच त्तक मुनिकी परीक्षा करके सम्यग्दृष्टि नमस्कार करे २१५ शिक्षा देनेके योग्य एवं अयोग्य व्यक्तिका वर्णन पंच अणुन्नत्तोंका और तीन गुणकब्रत्तोंका वर्णन कर चार शिक्षाब्रत्तोंका वर्णन भुनिके ग्रहण नहीं करनेके योग्य जत्तका वर्णन के मायावी भुति महापापी है १६८

२१९

श्र श्रावकाचार-संग्रह

सल्लेखनाका विधान एक-एक इन्द्रियके विषय-बश हाथी आदि प्राणी महान्‌ दु:ख पाते हैं भनोनिरोध करने और दुलेश्याओंके परित्यागका उपदेश

समता, वन्दनादि छह आवश्यकोंका वर्णन

दर्शन प्रतिमादि ११ प्रतिमाओोंका वर्णन

अनित्यादि १२ भावनाओंका वर्णन

चारित्र धारण करके पुनः विषय-लोलुपी जन विष्टाके कीड़े होते हैं सत्पात्रोंको दान देनेवाले पुरुष चक्रवर्ती आदि महान्‌ पदोंको प्राप्त होते हैं अष्ट द्रव्योंसे पूजन करनेवाला मोक्ष प्राप्त करता है

श्रावकके प्रधान कार्य दान और पूजन हैं

मुनिके प्रधात कार्य स्वाध्याय और भआत्मालोचन हैं

अल्प आहार, निद्रादिवाला पुरुष अल्प संसारी होता है

बिना जलसे धोये अशुद्ध द्रव्योंसे और खण्डित पुष्पोंसे पूजन करनेके दृष्फलका वर्णन शुद्ध द्रव्योंसे पूजन करनेके सुफलका वर्णन

अशुद्ध चित्त और अशुचि शरीरसे पूजन करनेके दृष्फलका वर्णन पुलाक आदि निग्न॑न्थोंका स्वरूप

पंच परसेष्ठीके गुणोंका वर्णंत

नवनीत आदि अभक्ष्य पदार्थेके त्थागका उपदेश

नामादि निक्षेपोंकी अपेक्षा चार प्रकारके श्रावकोंका वर्णन कृष्णलेश्यादि धारक जीवोंका वर्णन

पाक्षिक आदि श्रावकोंके स्वरूपोंका वर्णन

धर्म-प्राप्तिके कारण

बाईस परीषहोंको सहन करनेका उपदेश

पंच समितियोंका वर्णन

भनशनचादि तपोंका वर्णन

यतनापूर्व॑क श्रावक-ब्रतके घार॒क और सोलह कारण भावनाओंकी भावना करनेवाले मनुष्य

तीर्थंकर नाम कर्मका बन्ध करते हैं सम्मक्त्वीके प्रशभादि भावोंका वर्णन सम्यक्त्वके आाठ अंगोंका वर्णन भष्टाज्भु सम्यग्शञानकी आराघनाका फल सम्यग्द्शनके बिना तेरह प्रकारके चारित्रका धारण करना व्यर्थ है धर्मके (पुण्यके) माहात्म्यका वर्णन पापके दुष्फलका वर्णन मिथ्यात्व-सेवन और पंच उद्म्बर फल-भक्षण दिसे धर्म नहीं होता रत्वत्रय-धमंकी और क्षमादि १० धर्मोकी आराधना आदि सत्कायेसि ही धर्म होता है जीवके ना स्तित्व-वादियोंका निराकरण और आत्माका अस्तित्व-सावन

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गौ

२४२

२४३ २४४ र्ष५ २४७

विपयन्सूची २३

जीव ईद्वर-प्रेरित होकर सुख-दुःखादि भोगता है, इस मतका निराकरण रथ बौद्धोंके क्षणकवाद और सांख्योंके नित्यवादका निराकरण पा

जेनमतानुसार जीवके स्वरूपका निरूपण २४९ मिथ्यात्व, अविरति आदि करम-वन्धक्े कारणोंका निरूपण २५० गुप्ति, समिति आदि संवरके कारणोंका निरूपण २५१ चतुर्गत्तितमनके कारणोंका निरूपण हे

अहिसादि ब्रतोंके अत्तीचारोंका निरूपण २५३ सम्यच्त्व, जिन-पुजन, जिन-स्तवत और मौनकब्रतके अतीचार २५५ अहिसादि ब्रत्तोंकी भावनाओंका वर्णन

सामायिकके बत्तीस दोषोंका निरूपण २५६ वन्दतनताके वत्तीस दोबोंका निरूषण २५७

मिथ्यात्व अविरत्ति आदि कारणोंसे जीव संसारमें वँधता है भौर सम्यवत्व विरति आादिके द्वारा जीव मुक्त होता है

२५९ सम्यग्द्शंनकी महिमाका वर्णन २६० सम्यग्दशंनके आठ बंगोंका निरूपण २६१ सम्यग्दशंन ही मोक्षका प्रधान कारण है २६२

२०. श्रावकाचारसारोद्धार २६३-३६८ ग्रल्थका रका मंगलाचरण २६३ भरतक्षेत्र, मगध देश और श्रेणिक राजाका वर्णन २६७ भगवान्‌ महावीरका विपुलाचल पर पदापंण और वन्दनाथर्थ श्रेणिकका गमन २६७ श्रेणिक-द्वारा भगवान्‌का स्तवन, धमं-पुच्छा और गौतमस्वामीके द्वारा धर्मका निरूपण २६९ अपने लिए प्रतिकूल कार्यका दूसरेके लिए आचरण नहीं करना ही धमंका प्रथम चिह्न है. २७१ धमंकी महिमाका निरूपण २७२ पुण्यके सुफलोंका और पापके दुष्फलोंका निरूपण २७३ सद-गुरुका स्वरूप और अन्तरंग-वहिरंग परिग्रहका निरूपण २७७ सम्यग्दर्शनकी भ्राप्तिके अन्तरंग और वहिरंग कारणोंका निरूपण २७८ सम्यग्दर्शनके दश भेदोंका स्वरूप-वर्णन प्रशम, संवेगादि गुणोंका वर्णन का निःंकित अंगका और उसमें प्रसिद्ध अंजनचोरके कथानकका वर्णन २८ निःकांक्षित अंगका और उसमें प्रसिद्ध अनन्तमत्तीके कथानकका वर्णन श्टप्‌ निविचिकित्सा अंगका और उसमें प्रसिद्ध उद्दायन राजाके कथानकका वर्णन २९० अमूढहृष्टि अंगका और उसमें प्रसिद्ध रेवती रानीके कथानकका वर्णन ९४ उपगृहन अंगका और उसमें प्रसिद्ध जिनेन्द्रभक्त सेठके कथानकका वर्णन र्‌ ९६ स्थितिकरण अंगका और उसमें प्रसिदृध वारिषेणमुनिके कथानकका वर्णन ३०२ वात्सल्य अंगका और उसमें प्रसिद्ध विष्णुभुनिके कथानकका वर्णन ३०८ प्रभावना अंगका और उसमें प्रसिद्ध वज्ञकुमार मुनिके कथानकका वर्णन

३१६

२४ श्रावकाचा२-संग्रह

सम्यक्त्वके संवेग, निर्वेद आदि आठ गुणोंका स्वरूप-वर्णन सम्यवत्वके पच्चीस दोषोंका वर्णन सम्पक्त्वकी महिमाका वर्णन सम्याज्ञानकी उपासनाका उपदेश और उसका स्वरूप चारों अनुयोगोंका स्वरूप सम्यक्‌ चारित्रकी आराधन्ताका उपदेश अष्ट मूलगुणोंका वर्णन मद्यपानके दोषोंका वर्णन मांस-भक्षणके दोषोंका वर्णन मधु-सेवनके दोषोंका वर्णन नवनीत-भक्षणके दोषोंका वर्णन क्षीरी वृक्षोंके फल-भक्षणके दोषोंका निरूपण भक्ष्याभक्ष्यका विचार करके सर्व भक्षण करनेवाला व्यक्ति राक्षस है चर्मपात्र-गत तेल, घृतादिके खानेका निषेध प्राणोका अंग होनेपर भी मांस अभक्ष्य है, किन्तु अन्त, फलादि भक्ष्य हैं अज्ञात फल, अश्रोधित शाक-पत्रादि, द्विदल अन्न आदिके त्यागका उपदेश रात्रि-भोजनके दोष बताकर उसके त्यागका उपदेश श्रावकके वारह ब्रतोंका नाम-निर्देश अहिसाणुब्रतका वर्णन दयाकी महिमाका वर्णन हिसा पापके फलका और अहिसाणुव्रतके अतीचारोंका वर्णन हिसाका विस्तृत विवेचन सत्याणुब्नत्तका विस्तृत वर्णन सत्याणुक्नतके अतीचा रोंका वर्णन अचौर्याणुत्रतका विस्तृत विवेचन अचोर्याणुप्नतके अतीचारोंका वर्णन ब्रह्मचर्याणुत्रतका विस्तृत विवेच्च मैथुन-सेवन-जनित हिंसाका वर्णन ब्रह्मचर्याणुब्बतके अतीचारोंका निरूपण परिय्रहपरिमाणाणुब्रत्तका विस्तृत विवेचन परिग्रहपरिमाणाणुव्रत्तक अतीचारोंका बर्णन दिग्व्त गुणब्रतका स्वरूप और उसके अत्तीचा रोंका निरूपण अनर्थंदण्डविरत्तिगुणव्रत्तका समेद विस्तृत वर्णन भोगोप॑भोगसंख्यानगुणव्षत्तका विस्तृत विवेचन और उसके अतीचारोंका निरूपण देशावकाशिकशिक्षाब्रतका स्वरूप और अतीचारोंका निरूपण सामायिक शिक्षव्रत्का वर्णन

(8 ३४०

३४१ ३४३ ३४४ ३४५ ३४६ र४डट ३५० !! ३५२ जग ३५४ ३५५

३५७

॥ज

३५९ ३६०

विपय-सुची

सामायिक शिक्षात्रतके अतीचा रोंका निरूपण प्रोषधोपवास शिक्षात्रतका वर्णन प्रोषधोषवास शिक्षात्रतके अतीचारोंका वर्णन अतिथि संविभाग शिक्षाक्रतका वर्णन दाता और पात्रके त्तीन प्रकारोंका तथा कुपात्र और भपान्नका वर्णत दानके अयोग्य अच्नका निरूपण पान्रवानके महान प्रुण्यका वर्णन सल्लेखना धारण करनेका उपदेश और विधि-निरूपण सल्लेखनामरण जात्मघात नहीं, इस वातका सयुक्तिक निरूपण सललेखनाके अतीचारोंका निरूपण सप्त व्यसनोंके दोषोंका दिग्दशंन और उन्तके त्यागका उपदेश २१. भव्यधर्मोपदेद्ञ उपासकाध्ययन मंगलाचरण और श्रावकाचार कहनेकी प्रतिज्ञा भरतक्षेत्रवर्ती दक्षिण देशस्थ आमहूक नगरका वर्ण सज्जन-दुर्जन जनोंके स्वभावोंका वर्णन मगधदेश, राजगृहनगर और श्रेणिक राजाका वर्णन भगवान्‌ महावीरका विपुलाचलूपर पदार्पण और श्रेणिकका वन्दनार्थ गमन वल्दनके पश्चात्‌ इन्द्रभूति गणधरसे भ्ावकधर्मका श्रवण सम्यक्त्वका स्वरूप और उसके दोर्पाका निरूपण सम्यक्त्वकी महिमाका वर्ण तीन मकार, पाँच उदुम्बर फल एवं त्रसयुक्त पुष्पादिके भक्षणका निषेध रात्िभोजनके दोष वत्ताकर उसके त्यागका उपदेश सप्त स्थानोंमें मौन धारण करनेका उपदेश चर्मपात्रस्थ घृत-तेछादि तथा कन्दमूलादि अभक्ष्योंके त्यागका उपदेश सप्त व्यसनोंके सहष्टान्त दोष बत्ताकर उनके त्यागकां उपदेश सप्त तत्व और नव पदार्थोका निर्देश कर जीवतत्त्वका वर्णन तजीवादि शेष तत्त्वोंका स्वरूप-निरूपण जीवोंकी आयु, अवंगाहना, कुल, योत्ति आादिका विस्तृत विवेचन व्रत प्रतिमाके अन्तगेत श्रावकके बारह ब्रततोंका वर्णन सामायिक प्रतिमाका स्वरूप-निरूपण करके उसके दोषोंका वर्णन ध्यान, ध्याता, ध्येय और ध्यानके फलका वर्णन प्रोषधोपवास प्रतिमाका वर्णन दान और पात्र-अपात्रादिका निरूपण जिनालयमें जिन-विम्ब स्थापत करके उसके अभिषेक-पूजनादिका विधान पूजन-अभिषेकादिकों सावद्यरूप वतानेवालोंके लिए खरा उत्तर सचित्त त्याग आदि प्रतिमाओंका संक्षिप्त वर्णन

२५ ३६१

(8

३६२ ३६३ ३६७ ३६५ ३६९६ ३६७ १६ ३६०९-४०१ ३६९ ३७०

१९६ ३९७

२६ श्रावकाचा संग्रह

प्रन्थका रकी प्रशस्ति ३९९ परिशिष्ट ४०२-५३३

२२. चारित्र प्राभृतनत श्रावक-धर्मका वर्णन ४०५ २३. तच्त्वार्थसुत्र-गत श्रावक-ब्रतोंका निरूपण ४०६-४०९ २४. रत्नमाला-गत श्रावकंध मंका निरूपण ४१०-४१५

देव, शास्त्र और गुरूका स्वरूप-वर्णन ४१० श्रावकके वारह ब्रतोंका निर्देश ४११

वस्त्र-गालित जलकी पीने और स्तानादिमें उपयोग करनेका उपदेश साधुजनोंकी निर्दोष पुस्तक, पिच्छी आदिके देनेका उपदेश 23

साधुओंकी वेयावृत्त्य करने और जिनचैत्यालयादिके निर्माण करानेका उपदेश डर पंच भण ब्रत्तोंका संक्षेपसे स्वरूप-निरूपण तीन मकार और सप्त व्यसतोंके सेवनके त्यागका उपदेश ४१३१ पुष्य-प्राप्तिकि लिए नित्य-नेमित्तिक शुभ क्रियाओंके करनेका उपदेश बौद्ध, चार्बाक आदिके सन्‍्मान, पोषण आदिका निषेध * ४१४ दानसे ही पंच सूना-जनित पापकी शुद्धिका विधान )! विभिन्‍न प्रकारके प्रासुक जलकी काल-मर्यादा और उसके ग्रहणादिका विधान-निपेध ४१५

व्रत-हानि और सम्यक्‍त्व-दूषण नहीं करनेवाली क्रियाओंके करनेका उपदेश ** चर्मपात्रगत घृत्त-तेछादिके त्यागका उपदेश

२५. पद्मचरित-गत श्रावकाचार ४१६-४१७

धर्मका स्वरूप और श्रावकके वारह्‌ ब्रत्तोंका स्वरूप-निरूपण ४१६ मद्य, मांस, मधु-भक्षण, चूत्त-सेवन, रातिभोजन और वेश्यागमनके त्यागका उपदेश