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जीव न-साहिल्य

शेखक भ्री काका कालेखकर

हू मातड उपाध्याय, मंत्री, सस्ता साहित्य मंद,

नई दिल्ली

| दूसरी धार : १३४८

मुदक

अमरचन्‍न्द्र

राजदँस अ्रस,

नई दिल्ली १९-/४८

दो शब्द .

आचार्य काका कालेलकरके लेखोंका यह संग्रह नये रूपमें पाठकोंके छमने रखा जा रहा है काकासाइब अब हिन्दी साहित्य संसारमें भी सुविदित हो गयें हैं | वे हिन्दस्तान के ग्रिने चुने मनीषियोंमेसे हैं। मनीषि सुसंस्कार ओर सुरुचिकी दीक्षा देकर लोक-जीवनको असादयुक्त तथा कान्तिमय बनाते हैं | अपनी अक्ति ओेव॑ कृतिसे वे समाजके सांस्कृतिक मूल्योंका रक्तण श्रौर संवर्धन करते हैं| थ्रिस अर्थ काकासाइब सचमुच आ्रचाय हैं। वे श्राचायवान्‌ बुद्धियोगी हैं। श्रनकी वाणी केवल शाख- शुद्ध ही नहीं, तप:पूत और श्रनुभवसिद्ध भी है। श्रुसकी रुचिरतामें विशान की सृद्रमता और अनुभवका तेज है। विशनकला और अनुभवका सा मनोहर त्रिवेणीसंगम श्रौर कहीं शायद ही देखनेकों मिले |

काकासाहब ओक दूसरे और श्रुदात्त श्रथमें 'परिब्राजक' हैं | वे अपनी मातृभूमिको ही अपना तोर्थक्षोत्र मानते हैं| श्रिस पवित्र भूमिसे श्रोर अुस पर रहनेवाले सभी संप्रदायों तथा जातियों के लोगेंसे श्रन्हें सच्चा श्रेव॑ गहरा अनुराग है। वे थ्िस देशकी यात्रा निरंतर करते रहते हैं, कभो थकते हैं अबते हैं। अनकी श्रद्धा आर भक्ति नित्य बढ़तो हो जाती है श्रिसी- लिये अनके दर्शनमें विविधता, व्यापकता ओर सुगमताका मधुर संयोग है | अनकी दृष्टि केवल अखिल भारतोय ही नहीं, सार्वनाम है थ्रिसीलिये अुनके बिचार सर्वस्पर्शी और जीवन-निष्ठ हैं भारतवर्ष अ्रन्होंने सिर्फ नक्शोंमें नहीं देखा है| सभी प्रान्तोके जीवनके साथ अन्होंने प्रत्यक्ष परि- चय प्राप्त किया है। मक्तकों अपने झ्िष्टदेवताके दर्शनोसे जो आनंद होता है, काकासाहबकों भारतमाताके दशनोते बही आनन्द होता है श्रिसीलिये वे विर्मवासी रहे हैं | हमने बहुतसें चलते फिरते पुस्तकालयों की बात सुनी है काकासाहब ओेक जीतेजागते 'विश्वकोष' की तरह समाज साझ्क्ृतिक मूल्योका प्रकाश पैलाते हैं | जीवनका शायद ही ओऔसा कोशो पहलू हो जिसका अ्रन्दोने अपनी विशिष्ट दृष्टिसि विचार किया हो।

[खर ]

श्रुनके विचारोंमें सुविश्ता और वेशानिकता है, श्रौर श्रुन विचारोंको प्रकद करनेकी शेलीसे झुनकी रतिकता और व्यापक सहानुभूतिका परि- चय मिलता है।

सस्ता साहित्यमंडलने पहले काकासाहबके लेख “जीवन साहित्य'के नामसे दो भागोंमें प्रकाशित किये थे अ्नमेंसे कुछ चुने हुओ लेखोंके श्रतिरिक्त कुछ नये लेख भी श्रिस संस्मरणमें लिये गये हैं। मूल लेख काकासाहनने गुजरातीमें लिखे हैं श्रनुवादमें श्रनकी शेंलीकी सारी सुन्दरता और विशेषता ज्यों-की-त्यों लाना श्रनुवादककी सामथ्यंसे बाहर है। वह तो थतना ही कर सकता था कि अनुवादमें ग्रथहानि द्वोने दे। गुजराती भाषाकी भी अपनी ओक खास मोड़ है। अनुवादपर थोड़ी बहुत झसकी भी छाया है। लेकिन आन्तरप्रास्तीय सांस्कृतिक जीबनके विकासकी दृष्टि ति अनुवादके ये दोष दूषणभूत नहीं माने जायेंगे। अनुवादके विषयमें खिससे श्रधिक कुछ कहना अ्रविनय का लक्षण होगा आशा है, श्लिस “जीवन साहित्य” के द्वारा पाठकोंकी जीवन श्र साहित्य दोनोका श्रेष “जीवनदायी साहित्य” का स्थायी लाभ मिलेगा

कोल्हापूर (महाराष्ट्र) | १० दिसम्बर १६४८ | ““श्रीपाद जोशी

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विपय-सूची

जीवन-साहित्य

पुराने खेतमें नञ्मी जुताओी साहित्य-सेवा साहित्योपासना साहित्यकी आजकी ओक कसौटी ब्राह्मी साहित्यकार सौन्दर्यका मर्म

प्राचीन साहित्य

पत्रकारकी दीक्षा जीवनविकासी संगठन रस-समीक्षा

मेरे साहित्यिक संस्कार

जीबन-संस्कृति

संस्कृतिका विस्तार जीवन चक्र

सुधारोंका मूल सुधारकी सच्ची दिशा संयममें संस्कृति

पंच महापातक

खुन ओर पसीना ओशियाकी साधना बीर-धर्म

प्प्७

ध्दे

१०० श्ण्थ १०६ श््८ ११० १९६

जीबन-साहित्य_

स्वाभाविकता प्रतिष्ठित हो गयी। अस तरह जब मनुष्य अंघ- परंपराको फ्रेंक देकर छोटे मोटे हरेक पदार्थसे 'कोडसि ? तस्समि- स्वयि कि पीयेम ९! औसा सधाल पूछनेकी ड्िम्मित करता है तब घर्म-संस्करण होता है, जनतामें नया बल जाता है, विद्वानों को नयी दृष्टि प्राप्त होती है और झिस हदृष्टिका असर चौदद विद्याओं ओर चौसठ कलाओंपर पड़ता है

आज हिन्दुस्तानमें असी तरहकी तत्त्वजिश्ञासा, धर्मेजाग्र॒ति ओर कर्म-बिचिकित्सा सुलग अठी है। अत्येक वस्तुका रहस्य हम खोजते हैं, जीबलका परम रहस्य नये सिरेस जान लेते हैं और असे आचरणमें लाना चाहते हैं; नयी समाजब्यवस्था और नयी आचारबिधियों दारा हम अुसे समाजमें दाखिल कराना चाहते हैं और यह नया प्राण लेकर हम विचारकी दुनियापर शुद्ध सार्विक दिग्विजय प्राप्त करना चाहते हैं

आज ऋृष्ण और शंकराचार्य, बुद्ध और महावीर, चैतन्य आर नानक, मेसाया और महादी, सभी नये-नये अवतार लेनेबाले हैं, नये स्वरूप धारण करनेवाले हैं, शायद वे ओेकरूप भी होंगे, शायद अक दी व्यक्ति अनेक रूप धारण करेगा; क्‍योंकि हम >> आन्दोलित करनेकी हिम्मत और कोशिश कर र्द्दे हें।

साहित्यसेवा

में सादित्यसेवी नहीं हूँ; साहित्योपासक भी नहीं हूँ। हाँ साहित्यप्रेमी जरूर हूँ। मेने साहित्यका आस्वाद लिया है। असका असर मुमपर हुआ है। मैंने देखा है कि अस्कृष्ट साहित्य बुद्धिको प्रगल्म बनाता है, भावोंकी सृरम बनाता है, अमुभवकी

साहित्य-सेवा |

घुनकर विशद करता है, घर्मबुद्धिफो आाशत फरता है, !हृदथकी बेदनाको ज्यक्त और बनांता है; सहालभूतिकी गृद्धि करता है और आनन्दकों स्थायी बनाता है'। जिस चजहसे साहित्यके प्रति मेरे मनमें आदर है। लेकिन मैंने अपनी निष्ठा साहित्यकी समर्पित नहीं की है। साहित्यको में अपना जिष्ट देवता नहीं मानता साहित्यको मैं साधनके तौरपर ही स्वीकार करता हूँ, और बह साधनक्रे तौरपर ही रहे औसा--अगर आप मुझे माफ़ करे तो कहूँ कि--मैं चाहता भी हूँ। सोस्वामी तुलसी- दासजीके मनमें हनुमानजीके प्रति आदर था लेकिन अनकी निष्ठा तो श्रीरामचन्द्रजीके प्रति ही थी। सी तरह में चाहता हूँ कि हमारी अपासना जीवनकी ही हो। साहित्य तो ज.बनरूपी प्रभुकी सेवा करनेवाले अनन्यनिष्ठ सक्तके स्थानपर ही शोभा देता है बह जब अपनी ही अपोसना शुरू करता है तथ बह अपना धमम भूल जाता है। मनुष्य अगर अपने ही सुखका विचार करे, अपनी ही सहूलियतोंकी खोजके पीछे अपनी थ्रुद्धि ख्चे कर डाले और अपने ही अआनंदमें स्वयं मशगूल॑ हो जाय तो जिस असका जीवनविकास अटक जाता है और असमें विकृति वेदा होती है, श्रुसी तरह साहित्यके बारे में भी हृएता है। जब 'केवल साहित्यके लिये साहित्य” का निर्माण होता है, यानी लोग जब साहित्यकी केवल साहित्यके तौरपर ही अपासना करते हैं तब शुरूमें तो यह खसज खूबसरत दिखाओ देता है, विशेष श्राकषेक लगता है, जब तक अुसकी पूर्व-पुस्याओ खत्म दो शब तक छोसा भी महसस होता है कि असका बहुत विकास हो रहा है, लेकिन अंदरसे वह निःसत्त्व होता जाता है। सादित्यकों अुसका पोषण साहित्यमेंसे नहीं जीवनमेंसे, भनुष्यक्के पुरुषार्थमेंसे मिलना चादिये साहित्यमेंसे हो' पोषर प्राप्त करने वाला साहित्य ऋत्िम है, वद हमें आगे नहीं ले जां सकता

जीवन-साहित्य

चिस तरदहके कुछ कुछ संकुचित या तंग विचार में रखता हूँ। असलिये 'केवल साहित्यः के अपासकोंसे में डरता हूँ। अनका देवता अलग है, मेरा देवता अलग | लेकिन साहिसयों पासक बहुत अदार होते हैं। हालाँ कि में साहित्योपासक नहीं हूँ, फिर भी वह अस बातको स्वीकार करते हैं कि ' अविधिपू्वेकम्‌ ही क्यों हो, लेकिन में साहित्यका यजन करता हूँ, और मैं श्रद्धयान्बित' हूँ श्रतः साहित्यके विषयमें अपने कुछ विचार आप लोगोंके सामने पेश करनेकी धृष्टता में कर रहा हैँ आप सबकी अुदारतापर मुझे ब्िश्वास हे

मनुष्यके विचार, असकी कल्पनाओं, भावनाओं, भावुकताओं अथवा भावुकताप्रधान अनुभव दूसरों के सामने परिणामकारक तरीकेसे ब्यक्त करनकी शक्ति जिस बस्तुमें है वह साहित्य है--- यह मेरी अपनो साहित्यकी परिभाषा है। मुझे मालूम है कि तार्किक लोग श्रेक क्षणमें असको छिन्नभिन्न कर सकते हैं, लेकिन श्रपूर्ण मनुष्यकी बनायी हुआ परिभाषाश्रें अगर अपूर्ण हों तो जसमसें आश्वये क्या ? जिसमें भावोपर अनायास प्रभाव डालने की शक्ति है बह साहित्य है। सांसगिकता यानी छूतपन साहित्य- का प्रधान गुण है

यह प्रभाव अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी | भावनाओं मलुष्य-जीवनका लगभग सर्वस्व होनेकी वजहसे अनपर जिस वस्तुका प्रभाव पड़ता है अुस वस्तुकी तरफसे लापरवाह रहनेसे काम नहीं चलता। हवा, पानी, आहार बगेरा शुद्ध रखनेका आमह जिस तरह हम रखते हैं या हमें रखना चाहिये असीतरह, बल्कि उससे भी ज्यादा आग्रह हमें साहित्यकी शुद्धिके सम्बन्धमें रखना चाहिये | शीलकी तरह साहित्यकी रक्षा जहाँ की जाती है वहाँ जीवन पत्ित्र, प्रसक्न. और पृरुषार्थी होगा ही। अुच्चारण- शुद्धि, हिज्जोंकी शुद्धि, न्याकरसणाकी शुद्धि आदि प्राथमिक बालोंसे

साहित्य-्सेया ल्‍्‌

“लेकर साहित्यके प्रत्येक अंग-मत्यंधमें शुद्धिका आम्रद होना चाहिये। सेंकिन असमें ऋृत्रिमता आये, वाह्याडंवर आये, दंभ आजे, कमकांड आये

निर्व्याज़ मुग्धता शुद्धिका ओक पहल है और संस्कोरिता दूसरा पहलू दोनों तरहसे शुद्धिकी रक्षा की जाती हैं। लेकिन अ्रगर हम शिथिलताके ही हामी बन जायें और हर तरहकी बिक्ृतिको भी नजरअंदाज फरनेको तैयार हो जायें, अगर सामाजिक जीवनसें सदाचार्का और साहित्यमें शुद्धिका थोड़ा भी आग्रह रखनेका जो कोई प्रयत्न करेगा श्ुसके खिलाफ आवाज़ बुलन्द करके आसे चुप करानेकी कोशिश करे तो अससे समाज- का बेहद नुकसान होने बाला है। सामाजिक जीव॑नमें हो या साहित्यमें, शुद्धि रखने की जिम्मेदारी विशिष्ट श्रेष्ठ बर्गेकी ही होती है पुलिस या श्रदालतोंके ज़रिये सामाजिक सदाचारका सर्वोच्च आदर्श नहीं टिफ सकता। साहित्यकी भी यही हॉलंत है। समाजके स्वाभाविक अगुआ जब शियिल हो जाते हैं, डरपोक बन जाते है अथवा अ्रुदासीन हो जाते हैं तब समाजको बचानेवाली कोओ भी शक्ति नहीं रहती

साहित्यकी प्रवृत्ति हमेशा समाजसेवाके लिये ही होती हो सो बात नहीं | मानसिक आनन्द, सन्तोष, कु मलाहंट या ब्यधा- को प्रकट करनेकी, शब्दबद्ध करनेकी जो सहजभशृक्ति मनुष्यमें है अुसमेंसे साहित्यका अुद्राम होता है। संगीतकी सरह सादहित्य- का आनन्द भी मनुष्य अकेले-अकेले ले सकता है, फिर भी तमाम बागृब्यापार सामाजिक जीवनके लिये ही हैं साहित्यकी भ्रशृत्ति प्रधानवया अपने भाजपजधान मनन अथवा अदुगारोंको दूशरेमें आंकान्त करनेकी अच्छासे हुआ करती है। जिसलिये जह कहा जञा सकता है कि साहित्य अधानतया सामाजिक बजेस्तु है। जीव॑नकी सभी अच्छी चीजोंकी तरह सशा साहित्य आत्मनैषदी

6 जीवन-साशित्य

भी होता है और परस्मेपदी भी मनुष्यके सर्वोध सदूभुस् क्रुसके सामाजिक जीवनमेंसे पैदा होते हैं और तो और, अनन्यनिरपेक्ष मोक्षेच्छा भी सबेके साथ आत्मौपम्य अनुभष करनेके लिये ही है, यानी असका प्रारंभ और अन्त सामाजिक जीवनकी ऊृतार्थताके साथ ही है साहित्यके बारेमें भी औसा दी कहा जा सकता है। जिस तरह गायनके साथ तंबूरेकी आबाज्‌ वान लिया ही करती है अ्रुस तरह साहित्यके तमाम विस्तारमें जनहितका, लोक कल्याणका सर कायम रहना ही चाहिये। जो कुछ अससे विसंवादी होगा वह संगीत नहीं बल्कि मानसिक कोलाहल है। वह सादित्य नहीं बल्कि मानसिक जहर है। श्रेकबार हिन्दुस्तानके ओतिहासिक पुरुषोंकी सूचीमें मैंने श्रीमद्भगवद्गीताका नाम भी जोड़ दिया था। “जिसके व्यक्ति- त्यकी छाप समाजपर अलग-अलग समयपर अलग-अलग ढंगसे पड़ती है और झिसलिये जिसके चिरंजीवीपनका अनुभव हमेशा होता रहता है बह है व्यक्ति अथवा पुरुष” औसी परिभाषा की जाय तो हम यह मान सकते हैं कि भगवदूगीताको राष्ट्रपुरुष कहनेमें औचित्यका कोओ भंग नहीं है। साहित्यके बारेम भी यही बात है। श्रेक या अन्य प्रकारसे सामथ्य प्रकट करनेवाले व्यक्तिका हृदयसकेस्व होनेके कारण व्यक्तिके प्रभाषकी तरह अुस व्यक्तिके साहित्यका भी प्रभाव हुआ करता है। प्रभु, मित्र या कान्‍्ताके साथ साद्वित्यकी तुलना करनेवाले साहित्याचायोंने यही बात दूसरे ढंगसे कह्दी है। “प्रभु! की जगह आज हम “गुर शब्दको अधिक पसन्द करते हैं। गुरु, मित्र और जीवनसहचरी तीनों संबन्ध पत्रित्र हैं, झुदात्त हैं। साहित्यका बिरुद ओसा ही होना चाहिये। सामाजिक वब्यवहारमें हम चाहे जिस आदमी- को डक घुसने नहीं देते। चोर, शठ, पिशुन या मुजंगकी श्रेणीके लोगोंको हम देहलीअफे अन्द्र पैर नहीं ग्खने देते।

साहिल्फसेचा नर

अआहित्यके अपर भी हमारी औसी ही क्रोकी होनी चादिये 4 अप किन्र सनुष्य खाहे जितना शिक्षायारी क्‍यों हो, असे जिस तरह हस अपने बालघश्चोंके साथ बगेर किसी रोकटोकके मित्नने- जुलने नहीं देते अुसी तरह पापाचरणको अुत्तजन देनेवाले साहित्यको भी हमें अपने घर में घुसने नहीं देना चाहिये। घरसे बाहरके व्यवद्दारमें जहां सभी क्रिस्मफे लोगोंके साथ सस्वन्ध आता है वहां अच्छी और खराब बातोंको परखनेकी कला जिस तरह हम अपने बालकों को प्रदान करते हैं और ज्यादती करने वाले मनुष्यको दूर रखनेको सिखाते हैं ऋरसी तरह साहित्यमें भी दुष्ट साहित्यके हावभावोंमें फेंसकर असे दूर रखनेकी कला हमें अपने बालकींको सिखानी चाहिये।

लेकिन मैं जानता हूं कि आजकी हवा झिस तरहकी नहीं है। शिष्टाचारकी पुरानों बाड़ें त्तोड़नेका ही प्रयत्न हमने शरू किया है। अनके स्थानपर नये आदशेकी नयी मयांदाओं तैयार करनेकी बात हमें नहीं समी है कृत्रिम या यांत्रिक बाड़ोंकी टिमायत में भी नहीं करता लेकिन समाजहृदयमें कुछ कुछ आदशे तो होता ही चाहिये और अुस आदर्श की रक्ना करनेका आग्रह रखनेवाले समाजधुरीण भी चाहिये। वे अगर अपना यह स्व भावसिद्ध कुलब्रत छोड़ दें तो संस्कृति कैसे टिक संस्कृति तो अँगीठोकी आगकी तरह जबतक हवा चलती है तभो तक टिकनेबाली चं:ज़ है। पुरुषाथे और जागृतिकी चौकीके बिना श्रेक भो संस्कृति नहीं बचो है | संस्क्रतिको भकृतिके अपर नहीं छोड़ा जा सकता लेकिन आज तो औसा लगता है कि मानो हम सामाजिक अराजकता ही पसन्द करते हैं यह वो साफ ख़ाहिर है कि पुरानी व्यवस्था ऋब नहीं टिक सकती, टिकल़ी भी चाहिये ।! लेकिन ' पुरानेंकी जगह नयी स्यवस्था' रचतेक़े (लिये आवश्यक प्राश्यल हमारे समाजसें होना चाहिये। आऋशूनके

ष्य आीवन-साहित्य

आंकुशको बात में नहीं करता | में सो ओसा ही मत्नता 'हूं कि साहित्यत्र कानूनका अंकुश कमसे कम होना चाहिये। सदाबार- की सर्वोख्य कोटिका विचार करके कानून नहीं चलता कामून- की आंखें स्थूल होती हैं, जड़ होती हैं और अुलके अपाय अस- स्कांसे होते हैं साहित्य पर अंकुश होना चाहिये लोकमतका लोकमतका के मानी हैं संस्कारी, अुदार, चारिश्यवत्सल समाज- घुरीणयोंका औसा कुछ करने के लिये आजका समाज तैयार नहीं ' है यह मुझे मालूस हो सो बात नहीं लेकिन यह कहना ही पड़ेगा कि अससे समाज अपना ही जुकसान कर लेता है। 'नेको मुनिर्यस्य बच: प्रभमांणम” अस दलील की आड़ में हम सारी मर्यादाओंका छेद अड़ाना तो नहीं चाहते ? साहित्य है कलाका ही ओक विभाग असलिये कलाके नियम जिसपर भी लागू किये जाते हैं कलाके लिये ही कला है, कला कभी भी किसी वाद्य वस्तुके अंकुशको स्वीकार नहीं करेगी--श्रेसा कहनेवाले केबल-कलावादी लोग नीतिके अंकुशका हमेशा सज़ाक अड़ाते आये हैं। स्वात्मनि ओरेव समाप्त महिमा” अिस दरहकी यह कला देखते-देखते निरगल, स्वार्थी बन जाती है। और स्वार्थ- के साथ ससब कब टिका है ? .870 [0 8५5 5४८८ ( कला कलाके लिये) की परिणति 27६ ई07 धा।2 4ैएधं5र६ 8वॉटट ( कला कलाकारके लिये ) में हो जाती है

मेरा यह आप्रह नहीं है कि कलाफो नीतिका अंकुश स्थीका- गला ही चाहिये। लेकितस अिसका कोरण अलग है साहित्यके प्रास असका अपना गांभीये, अपनी प्रसन्‍नता और पविज्ञता क्यों ने हो ? हास्य-विनोद शिन तीनोंका विरोधी तो नहीं है। जितना ही नहीं वल्कि जह जिन तीनन्‍कों अश्य कोटिको पहुंचाकर दिखाता है। अगर साहित्य स्वधमेका पलन करे तो असे नीतिका अंकुश

' सवीआरना पढ़ेगा। साहित्य. जब हीन अभिशषिके नया कला-

खाहित्य-खेबा शत्रु विलासिताके शराबखानेमें जा पढ़ता है तव नीतिफो लाचार होकर आसे वहांसे अठाकर घर खाना पढ़ता है। स्वराब्य्मेया सुराज्यमें सदाचारी और स्वयंशासित साभरिकोंकी नगर-रंशकोंसे डरनेका कोओ कारण नहीं रहता

लेकिन कला और साहित्य शक ही वस्तु नहीं हैं। सुन्दरता साहिस्थका भूषण है कि स्वेस्व। साहित्यका सर्थस्व, साहि- त्यका श्राण ओजस्विता है, विकमशीलता है, सस्यवृद्धि है। जीवनके विविध लेत्रोंमें पौरुवकी वृद्धि करनेमें ही साहिंत्थकी अन्नति रही है हे

क्या विषय-सेचन समाजमें झितना क्षीण हो गया है कि बिलास-प्रेरक साहित्यके द्वारा असे श्रुतेजन देनेकी आवश्यकता आत्पक्ष हुआ है ? समाजकी तरह साहित्यको भो देहघारीके नियमोंके वश होकर अुश्य-नीच स्थितियां भुगतनी पड़ती हैं। जब समाजका सम्पूणे अ॒त्कष हो चुका हो, झुसके कारण आनेषाली संमद्धि भी थक गयी हो, तब मले ही समाज विलासितामें डूजकर सजेस्त्र खोनेकी तैयार हो जाय; लेकिन जब परतित समांज मानवजातिपर आनेवाली सभी आपत्तियोंका दुर्देदी संग्रहस्थान बन गया हो, करोड़ों लोग भूखसे या निराशाले तड़पते हों, पुरु षाथेका जहां तहां भाटा ही दिखाओ देता हो और बरसातंके दिनोंकी काली रातकी तरह चारों ओर अज्ञान फैला हुआ हो, औसे वक्तपर तो ढृदयकी दुर्बलता बदानेवाला, नामदे वासनाओं- को खूबसूरत करके दिखानेबाला और अनेक हीन इक्तियोंका बचाव या तरफ़दारी करनेयालां हत्यारा साहित्य हम पैदांन करे चढनेसे पहले ही पड़नेकी तैयारी कैसी ?

सिंहासनवत्तीसी और बेतालपश्चीसीके वातावरशसे हम अंभी कहीं बाहर निकले हैं, तो फिर अुसी जातावरंणका सुधरा और आडवरपरर संस्करण निकालकर क्या हस चढ़ संकैते है?

१० जजोवन-सहित्य

दुर्शुशका कलेबर भत्रे ही सुन्दर हो, असकी पोशाक भले ही . अविक्तित हो, अतने भरसे वह कम घातक साबित नहीं होता; बल्कि वह ज्यादा खतरनाक हो जाता है * अपनी समाज-न्यवस्थाकी सुन्दरताका हम चाहे जितना बखान करे, मगर अुसमें आज अक जुटि स्पष्ट 230 देती है। ओक जमाना था जब हम सब संस्कृतमें ही लिखते थे। « असलिये हमारे प्रौद और ललित विचार सामान्य समाजके लिये दुष्भ्राप्य थे लेकिन अुस वक्त संत-कवि और कथा-कीतेन- कार वह सारा कीमती माल अपनी शक्ति के अनुसार स्वभाषाकी फुटकर दूकानोंमें सस्ते दाम बेचते थे। मुगल-कालमें अ्रुदू की प्रतिष्ठा बदी और अरबी, फारसी भाषाओंसे कवियोंको प्रेरणा मिलने लगी। अंग्रेजी जमाना शुरू हुआ ओर अपनी सारी मानसिक खराक श्रंशेजीसे लेनेकी हमें आदत पड़ गयी। अुसका अच्छा और बुरा दोनों तरहका असर हमारी मनोरचनापर पड़ा है; साहित्यपर तो पड़ा ही है| आजकलके हमारे अखबार मासिकपत्रिकाअं नये जमानेके विचार फुटकर भावसे बेचनेका काम करने लगी हैं लेकिन जिन तीनों, युगोंमें गरीब श्रेणीके ज्लोगोंके लिये, देहातियों और मजदूरोंके लिये, स्त्रियों और बालकों- के लिये विशेष प्रयास नहीं हुआ है। अशिक्षित समाजमें भी अनका सामाजिक प्राण बहुत कुछ साहित्यका निर्माण कर्ता है। हमारे संस्कारी देशमें साधुसन्तोंकी कपासे असमें कुछ वृद्धि - हुआ हो तो अससे आश्रयोन्वित होनेका कोओ कारण नहीं लेकिन ज्यादातर मध्यम भेशीका ही बिचार हम हमेशा कस्ते आये हैं। हम यह भूल गये हैं कि यरीब लोगेंका जीवन सन्ते.ष- मय, आशासय ओर संस्कारसय करना हमारा धार्मिक कर्तव्य है.।.कुछं झिनीगिनी कद्दानियोंक़ो ओोड़ दें तो हमारी कहानियों ओर अुपन्यासोंमें गरीबोंके करूए काब्यमय जीवनका विचार

च्की

साहित्य:्सेया 'श 'भी नहीं होता धुराशकारोंने जिसः तरहः अत, ऋप्सरा और आऔध्योसे भरे हुए स्वगेंकी ऋलपतवा, की, अस ,ताह आज़कल्नके अुपन्यासकार ओसेही किसी श्रेकार आदइम्रीकी कल्पना करते हैं जो वकील-बैरिस्टर हुआ हो, जिसने विलायतका सफर किया हो या वसीयतनामेसे जिसको खूब पैसा मिला दो और अुसफके “आत्मनि संतुष्ट” निरर्थक जीवनका सविस्वार बखेन करते हैं-। जातिभेद हमारे मनोरथोंमें भी शितना भरा हुआ है कि सब्य श्रेणीके बाहरकी दुनिथाको हम नहीं देख सफते बिलकुल गरीब लोगोंका जीवन हमें द्यापात्र किन्तु रहस्वशून्य लगवा हे शीसपके अुस बारहसींगेकी तरह हम सिरपरके सींगेंके गरूर॑में अपने पतल पेरोंका तिरस्कार करने लगे हैं, या तिरस्कार करने जितना भी ध्यान हम अनकी तरफ नहीं देते। कमे और पुनज़ेम्स-

ध्ञ्ञ

की घटाओं सिरपर मंडरा रही हैं। हमारा लोकप्रिय साहित्य ' हमारी सामाजिक स्थितिका सधचन करता है। जो कुछ दिलसें होगा वही होठोंपर आयेगा रारीबोंकी मुश्किलें फौन-कौनसी हैं, झुनका दर्वे-दुःख क्या है, अनके सवाल कितने पेचीदा और विशाल हैं अिन सब बातों पर जिम्मेदारीके साथ व्रिचार करके असली सवाल हल कर सके औसी योजना जब दडोगी तभी गरीबोंके दिल्लोंमें कुछ आशा पैदा होगी त् ? जिसकी हम औरन लेते समय लेनेवालेके दिल्लमें केसी भावना अत्पक्ष होगी हमारा

प्र लीवम-साहित्य

अशहित्य अगर हमें अपना युगधर्म बताये और झअुस धर्मफा आलम करनेकी प्ररशा हमें दे तो बह अन्य सब प्रकारसे सरस होते हुओ भी अरे विफल ही कहना चाहिये ..ग़रीबोंको बाहर रखमेके लिये जिस तरह हम किवाड बन्द “कश्के खाना खाते हैं और पंक्तिमेद का प्रपंच रचते हैं. अआुसी तरह हमने साहित्यकी विशिष्ट कठिन शेलियोंको अपनाकर झ्ञान- की प्याञ में जातिभेद पैदा किया है। अदात्त, श्रुन्नत विचार आम अनताफी जिस आसानीसे मिलने चाहिये वह नहीं मिल सकते हमारे साधुसन्तोने गरीबीका त्रत ले लिया था, असी अलेये वे गरीबोंकी सेजा कर सके और गरीबोंके लिये प्राशपुरो साहित्य लिख सके हिन्दुस्तानकी सबसे बड़ी ताक़त अुसकी -अन-संख्य। है। लेफिन हमने गरीबोंका दोह्‌ करके असी बलको आररूप बना दिया है | जबतक हम गरीबोंके लिये साहित्य 'लिखेंगे, हजारों की तादाद में वाहर निकलकर गरीबोंको हमारा अअितिहास और आजकी “हमारी स्थिति, हमारा काव्य और 'हमारा घर्म तथा अ्रुसकी खूबियां सममाओँंगे, अपने जीवन पर जमी हुओ राख हटाकर झुसे प्रदीप्त करने की भ्रेरणा देंगे तब तक हमारा साहित्य पांडुरोगी ही रहेगा साहित्यकी अ्ुन्नतिके लिये तैयार होनेबाली योजनाओं में कोष और सन्द्भप्रन्थ, झितिहास और विवेचन, पाठ्यपुरतकें और भ्रसाशपन्ध, परिषदें और समितियां--बहुत कुछ बातें होती हैं। वह सब छोड़कर साहित्यके श्रुद्धारके लिये गरीब जसताकी सेवा करने की सूचना में कर रहा हूं यह देखकर -कुछ लोगोंको औसा लगेगा कि में साहित्य-भंडलको समाजसुधार-परिषद सम- 'मनेकी भूल करके बातें कर रहा हूँ। मुकपर यह अलजाम भले ही लगाया जाय लेकिन मैं तो निश्चित रूपसे यह मानता हूं कि ओेड फो जिस तरह प्रधानतवा जमीनमें से ही पोषश मिलता है,

साहित्य-सेवा: शक

अुस तरह साहित्यका पोषण संमाजमें ही दे खादबशा- और धमनिष्ठा में से ही हमारा साहित्य ससद्ध होनेश्ाला, है जिखकें:' मुझ़े सनिक भी शक नहीं है

अल्लिखित झाजकलकी योजनाओंको में-नीका दिश्लाना नहीं' चाहता अऋनमें यथा-शक्ति भाग सी लेना चाहता हूं लेफिल असली बातको भूल जानेसे काम चलेगा

जहां पुरुषार्थ की कमी हों जाती है और जीवनमें शिविल्ञता जाती है वहां साहित्यके बारेमें अल्पसन्तोष और रसिकवाका छिछलापन स्वाभाविक रूपसे जाता है। आज हम महाकाब्य नहीं लिख सकते, हमारी प्रतिभा चौदह पंक्तियां किसी तरह परी करनेसे पहले ही सूख जाती है---जिस तरहकी आलोचना में नहीं. करना चाहता काज्यकी लम्बाओ-चौड़ाश्रीपट में अधिक जोर देना नहीं चाहता।लेकिन हमारे काज्यविष्य अआुत्तःरा अथवा गंभीर नहीं हुआ करते, दमारे काब्यविवेचन सर्वकष और अ॒त्कट नहीं हुआ करते ओसी आलोचना में जरूर करूँगा

साहित्य तो ज्यादातर ज्यक्तिगत प्रयास ही है| वह जब तक गंभीर और दीघे अुद्योगके परिण्यामरूष होगा तब तक छिछला ही रहेगा। औश्वरने असाधारण प्रतिभा प्रदान की हो तो भी वह शक्ति बीजरूप ही होगी। मनुष्यकोी कमसे कम मालीका काम तो औमानदारीके साथ करना ही चाहिये। साहित्यमें सहयोग के साथ काम किये बिना भी चलेगा सहयोगके लिये जो सदुगुण आवश्यक हैं अन्हें अपनेमें लाये बिना अब एक कदम भी आगे बढ़ना मुश्किल है ! सिद्धान्तका आग्रह, स्वभाव-भेदको नजरअन्दाज करनेकी शक्ति, सफसीलमें आुतरनेकी कुशलता और ओेफ ही संकल्पसे लम्बे अरंसे तक चिपके रहनेकी हृदता--चिन साभाजिक सदुगुशोका विकास अगर हम करेंगे तो हमारे हाथों कुछ विशेष साहित्यसेवा हो ही सकेगी

श्र जीवने-साहिस्य “अह तो हुओ साहित्यकी सेवा किन्तु ' सब्चे साहित्यकों “निर्माण तो जनताके पुरुषार्थका ही फल है। 'कारभार (कारोबार) में दखल देनेकी झ्िजञाजत होगी तो करभार भी नहीं दिया जा सकता ।? झअिस जगविख्यात सूत्रके पीछे सिर्फ भाषासौष्ठव' या अनुप्रासकी लज्जत नहीं है। अंसमें लजञतकी अपेक्षा श्मेरिकन जनताका पुरुषाथे ही प्रमुख बस्ठुहै। साहित्यकी अन्नति जनता की अन्नतिके साथ ही होती है। आपके जिलेके किसानोंने गुज- राती साषामें जो वृद्धि की है वह अपनी दो-चार परिषतदें भी कर सर्वेगी। 'हमने वल्लभभाओके हाथों अपना सिर सोंपा है 'कि नाक |! अस बचनपर गुजराती जनताको हमेशा नाज़ रहेगा। 'इमारे खर्चेंसे बन्दु्के और तोपें रखते हैं मगर कमो दिखाते भी नहीं हमारे बालबच्च को बन्दुकों ओर तोपोंका मजा चखवायेंगे तो हमारी औलाद तो सुधरेगो ।” यह ओेक ही वाक्य गुजराती भाषाको चीयेशाली वनानेके लिये काफ़ी है | साथरमतीके किनारे गांधीजीने और बारडेली के खेत में वज़्ममाओने जिस भाषाकों गढ़ा है बह भाषा अपनी स्वाभाविकतासे ही धीरोदात्त और प्रौद़ बनी है। साहित्य तो जनताके पराक्रमका प्रसाद है। बूढ़ा मिशनरी टेलर हमसे कह गया है, * यथा भाषकस्ततथा भाषा? साहित्यकी भ्रुन्ञनति करनी द्वो तो अपने जं,बनको श्रुपन्नत करो। साहित्य जीबनकी छाया है, जीवनकी सुगंध है साहित्योपासना

फोझी परीक्षामें पास हो जाय, किसीके घर झड़का पैदा दो, 'किसीका बिछुड़ा हुआ भाओ फिरसे मिल जाय, या किसीको

शा० ३२-६-२८ को ' सूरत-साहित्य-संद्यक्रे वाधिक उत्सव के -अवसरपर दिया हुआ भाषस +

साहित्योपासला श्श्‌

'ल्ाटरीमें छिनास मिल जाय तो अस खबरका' सर लानेवालेकों यह कुछ कुड् अनाम देता है भालिक को तारका महत्व पजितना अधिक दहोमा अतनी मात्रामें तार लानेवालेके विषयमें शक प्रकारकी अुपकार-बुद्धिसी असके मनमें रहती है। और अच्छा-सा अनाम देकर अस आपकारको पूर्ति करने-

की कोशिश करता है। असलमें देखा जाय तो तार लानेवालेका अपकार कैसा ? तारका मज़मून बनानेमें आसंका हिस्सा थोड़ा ही हुआ करता है ? मनिआडेर या पारसल लानेवाले डाकियेकी हालत भी असी ही है।

फिर भी आनन्दमूढ़ होना मनुष्यका स्वभाव है। लेकिन अस मनुष्यस्थभावके कारण झअनाममें मिला हुआ पेसा शेबमें डालनेवाला डाकिया अगर अपनी ही बड़ाओ महसूस करने लग जाय तो अुसके जैसा मूरख बही है|

अध्यापककी कुर्सापर बैठकर बिद्यार्थियोंके सामने सुन्दर साहित्य परोसनेका काम जो लोग करते हैं श्रुनक्के श्रति भी असी तरहकी ऊृतज्ञताबुद्धि विद्यार्थियोंके मनमें रटा करती है साहित्य- क्षेत्रमें अच्छे-अच्छे फल चुननेसें अध्यापककी कुशलता, सदभिरुचि और विद्यार्थीका कल्याण समभनेकी सदूबुद्धि-आअन सक बातोंको महस्व है असमें कोओझी शक नहीं | लेकिन अगर अध्यापक शओसा गये करेगा कि श्रुन परिपक्च साहित्यफलोंको मानो अुसीने जन्म दिया है, वो अुसका वैसा करना हस्यास्पद होगा।

औसा मानना, कि इसमें जिस वस्तुसे आनन्द हुआ अुसी बस्तुका हमारे कहनेसे-आस्थाद लेकर दूसरा आदमी अतना ही आन॑ंदित हो जाय तो वैसा करके शुसने हमारे आनन्वकी दुगुना बनानेमें मदद दी-यह असीका हमारे अपर झुपकार है, शायद डीक द्वोगा

जो हो, दुनियाकी वरफ देखनेकी दृष्टि और जीवनको छान्‍नतः

१६. जीवन-साहित्य

बनानेका आगे जिस साहित्यमें विशद और सुभग ढंगसे व्यक्त - हुआ हो वह साहित्य सिर्फ़ पढ़कर रहने देनेके लिये नहीं है; बल्कि अशृतमसय रसायनकी तरह असका विधिपुर:सर आदर- युक्त सेबन करना पड़ता है परन्तु जो ओक बार साहित्योपजीबी जाता है असे घी या खीर परोसनेकी दर्वी (चमची) की तरह

सिर्फ पश्ेसनेका आनन्द लेकर ही बैठे <हनेकी आदस पड़ जाती है। और वह जिसी बतका विचार करता रहता है कि वह मिठाई किस तरह लोगोंके सामने परोश्तनेसे परोसनेबालेको मिलनेवाली वाह-वाही असे मिले। यह दर्बीश्रत निष्काम हो था सकाम, जीवन को उन्‍नत करनेबाला तो हरगिज़ नहीं है

साहित्य-अच्च साहित्य-असलमें देवा जाय तो हृदयमें आमभिजात्य अत्यन्न करनेका और जीवनकों अन्नत बनानेका अ्रक साधन-समात्र है। साहित्यका केवल प्रचार करनेकी अपत्ता असे हजम करके, अपना जीवन अन्नत करके, सेवाद्वारा अस जीवन की सुगन्धि फैलाकर समाजको और अपनेको कृतार्थ बनाना चाहिये। असी सेवा करते-करते हमको भी किसी दिन सरस्वती बैखरीका अपयोग करनेका मौका मिल जाता है और हमारे हाथसे या मुखसे प्रसन्‍न साहित्यका निर्माण होता है। अस ढंगसे होनेवाले साहित्यका प्रचार अपरिहाय, सहज और शुभ-परिशासकारी होता है

अच्छा साहित्य देखकर मनमें सिर्फ परोसनेवाले की बृत्ति जागृत नहीं होनी चाहिये, बल्कि 'अष्टे: सह भुज्यतां! की प्राचीन आश्ञाके अनुसार या सामाजिक मनोवृत्तिसे अुसका सेवन करके अष्टमिन्रोंके साथ अपना जीवन अन्नत और परिपुष्ट करने की तरफ़ ही हमारा कुकाब होना चाहिये |

यहां तक किये हुओ विवेचनमें कोओऔ असाधारण कात कहीं हो सो बात नहीं। लेकिन परोसमेकी व॒स्तिका सेष आाजकलफे.

साहित्यकोी आजकी अऋक कसौटी १्$

अध्यापक, लेखक, प्रचारक, कवि और पत्रकार सबमें बहुत बढ़ गया है और असलिये साहित्यका सेबन करके साध॑ना द्वारा असे हज़म करके जीवन को अन्नत बनानेकी ओर शख्ितनी लापरवाही होने लगी है कि अक्लमंद लोगोंको भी यह छोटीसी सूचना करने की जरूरत पैदा हो गयी है। कोओ भी ग्रंथ पढ़ते वक्‍त भ्रंथकारकी ब्ृत्ति और टृष्टिके साथ तदाकार होकर पढ़ना चाहिये। लेकिन भन्थके बारेमें कभी प्रामाय्यबुद्धि अ्र॒त्पन्न नहीं होने देना चाहिये। ज्ञान चाहे जहांसे, चाहे जेसा मिले तो भी तारतम्य बुद्धि तो अपनी ही होनी चाहिये। प्रत्येक ग्रन्थका कालिक, देशिक और बैयक्तिक (व्यक्तिगत) संस्करण करना ही पड़ता है। यह जो कर सकता है श्रसीका वाचन सफल और कऋताथे होता है - दिंडलगा जेल, १६३२

साहित्य दही आजकी अंक कसौटी

संस्कारी लोगोंका पत्त लेकर राजा भतृ हरिने साहित्य, संगीत ओर कलासे विहीन लोगोंको बे-सींग-ओऔर-पू छके पशु कहा है यह लिखते समय भत्‌ हरिके मनमें साहित्यके बारेमें कितना चा खयाल होगा | आजकी प्रथाके अनुसार अगर हमने अस साहित्य-स्वामीसे पूछा होता कि “आपकी साहित्य की परिभाषा क्या है ९? तो तुरन्त श्रेक वाक्यमें असने कह दिया होता, “नरपशुको जो पुरुषोत्तम बना सकता है वह साहित्य है।' अत हरिका अकान्ततो निःस्वृष्टः पंडित लोभ या कीवतिसे खललचायेगा, राजा से भी ढरेगा। श्ैसे ही भमनुष्योंको हम साहित्यवीर कद्द सकते हैं

श्प जीवन-साहित्य

साहित्य दैवो शक्ति है। अिस शक्तिके बलपर नि्धेन मनुष्य भी लोकप्रभु बन सकता है और महान्‌ सन्नाट भी राजदंडसे जो कुछ नहीं कर सकते अश्रुसे शब्दशक्ति द्वारा आसानीसे साधता है राजाको तनख्वाह देकर अपने यहां आखणत्राणप्रवण- मतिः हृदयशुन्य सिपाही रखने पड़ते हैं लेकिन साहित्यसम्राटके पास सहृदय सज्जनोंकी स्वयंसेवी फौज हमेशा तैयार रहती है। सश्चा साहित्यवीर यह नहीं कह सकता कि फलां चीज भेरे लिये “अशक्य! है। साहित्यकी दीक्षा लेनेके बाद असे ते प्रत्येक न्याय्य ओर धर्म्य कार्य अपना ही समझना चाहिये | सुखी ले!ग फुरसत- के बक्त समय बितानेके लिये कुछ अच्छासा साहित्य पढ़ना चाहते हैं। असकी पूर्ति करनेसे और भाषा सौन्दर्यक नये-नये प्रकार आत्पन्न करनेसे साहित्यकी सेवा हो गयी ओअसा कोओ माने लोगोंमें अ॒त्साह पेदा करना, लोगों की शुभव्वत्तिको जागृत करना, और सरस्वतीके प्रसादसे लोगेका धर्मतज प्रज्वलित करना साहित्यकारका काम है। सिफे जनरंजन करना, लोगोंमें जा-जो बृत्तियां आुत्पन्न हेंगी अन सबके लिये पयाप्त आहार दे देना साहित्यकारका धंधा नहीं है। 'असे लोगे.में में नहीं हूँ!--- कहकर भत्‌ हरिने गाया था:-- “न नटा विटा गायका परद्राह-निबद्ध-बुद्धय:” अित्यादि। सौन्दयके साथ अगर शील हो तभी वह शोभा देता है, साहित्यके साथ सात्बिक तेज हो तभी वह भी कृतार्थ होता है। हमारे ज़मानेमें मानवताकी कसोटी करनेवाला ओक बड़ा सबाल हमारे सामने खड़ा है प्रत्येक मनुष्यको बह कसता है--- राजसेवकको तथा जनसेवकको, धर्माधिकारियोंको तथा अर्थाघि- कारियेको, हिन्दुओंको तथा औरोंको | जिस तरह खेतोंमें, हमारी धारणाओंसें अस्पृश्यता घुस गयी है, बह जबतक जड़मूलसे निकल जायेगी तबतक हमको शान्ति मिलनेवाली नहीं है।

ब्राह्मी साहित्यकार श्च

राजनैतिक पुरुष कमर कसकर असके पीछे पड़े हैं। सामा- जिक रूढ़ियोंके विषय में अुदासीन रहनेबाले हमारे साधुसन्तोंने आस अस्पृश्यताको बदनाम करनेके लिये अपनी प्रासादिक घाणीका अयोग किया है महाराष्ट्रमें वैश्योंमें तुकाराम, और अआह्मणु में गहस्थाश्र्म! अकनाथ और बद्याचारी रामदास अस्पू- श्यताको बदाश्त कर सकते थे गुजरातमें ज्ञानी संत अखो और भक्तशिरोमणि नरसेया अस्पृश्यता को दूर करनेके लिये धर्मवीरकी तरह लड़े हैं। आजके जमानेमें श्रद्धामूर्ति श्रद्धानन्दजीका बलिदान भी असीलिये हुआ है। साहित्य-बीरोंकों मी आज अपनी शक्ति--शक्तिसवेस्व--खिसी धर्मकायेमें लगानी चाहिये श्रस्वृश्यतानिवारण हमारा युगधर्म है अससे पहले कि हम मर जायें, अस्प॒ृश्यता मर ही जानी चाहिये | वरना सनातन धर्मके भी टिकने की आशा नहीं है। अब देखना है कि आजका साहित्य अिस ओेक वीरकमकी सफलता के लिये क्या-क्या करनेको तैयार है “सन्‌ १६२६

है

ब्राह्मो साहित्यकार

अस विशाल विश्वमें हमारे लिये जीवनसे श्रेष्ठ कोझी भी वस्तु नहीं है। हम जो कुछ देखते या सुनते हैं, जो कुछ हमारे मसनमें या अनुभवमें आता है वह सब जीवनके क्तेत्रमें ही जाता है | कल्पना-सृष्टि और आदश-सृष्टि भी जीवन-जगतके दो खंड ही हैं और अज्ञात अनन्त तो जीवन-जगतका जितिज कट्दा जा सकता है।.

और मरणको क्या हम जीवनच्तेत्रके बादहरका समकेंगे ?

२० जीवने-साहित्य

नहीं, हरगिज़ नहीं। मरण भी जीवन हीकी ओक अरत्कृष्ट बिभूति है। जीवनमें जो कुछ अपणे रह जाता है वह मरणमें “४४ कृतार्थ होता है मरण के बारेमें हम ज़रूर कह येथें नाहीं काली कोणाची निरास | आल्या याचकास कृपेविशीं

( यहां तो चाहे जो याचक जाय, अुसके कभी निराशा नहीं हुआ करती। सबके अपर अ्रुसकी ओकसी ही कृपा रहती है ।)

दिन और रात मिलकर जिस तरह पूरा दिन एक होता है अुसी तरह जीवन और स॒त्यु दोनों मिलकर सम्पूर्ण जोवन होता है। दिनके वक्त सत्र सफ़ेद अँधेरा फैला होता है और असलिये हम सिफ्र श्रेंक सूये और ओक प्रथ्वी तक ही देख सकते हैं। रातके वक्त काला निर्मल प्रकाश चारों ओर फैल जाता है. जिससे श्राकाश खुला हुआ दिखाई देता है, विस्तृत मालूम होता है, श्रुस प्रकाशमें हम अनेक प्रथ्वियाँ और अ्रनन्त सूर्य देख सकते हैं। रात्रिका वैभव दिनके वैभवकी अपेक्षा कओ गुना अधिक होता है और असीलिये अनन्त सूर्योके दर्शन श्रेक साथ होते हुओ भी हमें अनमेंसे किसीका भी ताप सहना नहीं पड़ता अनन्त कोटि सूर्य श्रेकत्र चमकते हैं, फिर भी वह हमें शान्ति ही प्रदान करते हैं !

जिस तरह मनुष्य अपने बचपनमें स्कूलमें बहुतसे सबक सीखता है और बड़ा होनेपर ब्यापक जीवनमें अुन्हें अआुपयोगमें लाता है या प्रयोगशालामें छोटे-छोटे प्रयोग करके बादमें लोक- व्यवहारमें श्रुन प्रयोगोंका विस्तार करता है, असी तरह हम अपनी सारी आयु जो व्यक्तित्व और अध्यात्म आत्मसाव करते हैं भुसीको मरणके द्वारा व्यापक और बृहत्तम बनाते हैं। झिसी- लिये ओऔसा कहा जाता है कि मरण तो जीवनका नया और अल्कृष्ट संस्करण है। जीवन और मरश- मिलकर जो ओेक

न्ाह्ी साहित्यकार २५१

बदत्तम वस्तु बनती है असीको ब्रह्म कहा जाता है। अससे अलग कुछ भो नहीं; अुससे अुज्ष कुछ भी नहीं। अनन्तसे अधिक अज्ष क्या हो सकता है ? अनन्तकी ओर देखनेके पहलू अनन्त होते हैं, लेकिन मूल वस्तु तो “श्रेकमेबाद्वितीयम! ही है

3“कार प्रणव जिस तरह परजह्मका वाचक है अुसी तरह साहित्य भी जीवनका--सम्पूर्ण जीबनका--वाचक हो सकता है। खअतनी बड़ी प्रतिष्ठा साहित्यकी है। लेकिन असकी साधना अत्यन्त सावधानीसे, श्रुचित ढंगसे होनी चाहिये। जिस तरह भूर्तिकी प्राशप्रतिष्ठा करनेके बाद ही श्रुसे देवत्व प्राप्त होता है, अुसी तरह साहिस्यकी प्राशप्रतिष्ठा करनेके बाद ही अ्रुसे प्रणब- पूज्यता और वाचाशक्ति प्राप्त होती है प्राशपतिष्ठा करना श्रेक देवी विद्या है, अमर-कला है | यह विद्या, यह कला जिसने प्राप्त की है ओेसा कबि शायद ही मिलता है, कविका नाम धारण कर मुर्गकी तरह छाती निकालकर अधर-अधर भटकने-बाले पामर जीव अनेक हैं | अनकी तो हम बात ही छोड़ दें

प्रतिभाशाली चित्रकार सृष्टि-सौन्दयको चित्रित कर अुसे स्थायी बनाता है। यों तो सष्टि-सौन्दर्य हम अपनी आँखों देखते ही हैं, असे चित्रवद्ध करनेकी क्या ज़रूरत ? ज्यादा से ज्यादा अ्रेकाध छाया-चित्रकार-(फोटोप्राफ़र)-की सदंद लें तो काफ़ी है लेकिन चित्रकारका काये तो कुड और द्वी है। वह यह सिखाता है कि प्रकृतिका सौन्दर्य आँखसे नहीं अपितु हृदयसे कैसे देखना ध्वाहिये। प्रत्येक सृष्टिकी जगह वह प्रति-सृष्टिका निर्माण करता है। अुसकी बनायी हुओ झअिस नवीन स्टृष्टिका जीवनमें अन्तमोष होनेपर भी वह साफ़्तौरपर जीवनसे अलग ही दिखाओ देती है; और नित्यके अनुभूत जीवनपर कुछ और ही अलौकिक प्रकाश डालती है चित्रकार की प्रतिमा अन्तबोह्य विश्वको हृदयश्लोत्मे 'शंराॉबोर कर रसस्निग्ध बनाती है। अिसीलिये तो रसिकों की

श्र जीवन-साहित्य

हृष्टिमें वित्रकार तीथरूप बन जाता है| अिस तरहके अथ कोटिके चित्रकार दुनियामें बहुत ही कम हुओ हैं नाम-मात्रके चित्रकार तो हर घरकी दीवारपर लटकते या प्रत्येक प्रकाशनके अपेरेमें सोते हुओ दिखा देते हैं

सच्चा साहित्यकार सबक नहीं सिखाता, बल्कि रृष्टि देता है। असीलिये शिक्षकके पदपर बेठे बिना ही वह गुरुस्थान प्राप्त करता है। किसी श्रंधेका हाथ पकड़कर अगर असे हम एक कमरेमें ले जायें और बहाँकी प्रत्येक वस्तुका उसे स्पशे कराफे अस कमरेका परिचय दिला दें तो वह उसमें आसानीसे रह सकता है और अपना नित्यका व्यवहार भी चला सकता है। लेकिन अतना मंकट करनेके बजाय अगर हम अस अंधेको दृष्टि दे सके तो शक क्षण पूर्वका वह अंधा कमरेकी सभी वस्तुओंका मानो स्वामी बन जायगा | फिर तो असे कमरेकी हर चीज़का परिचय करानेकी ज़रूरत नहीं रहती अब तो वह हमारा आश्रित नहीं, साथी बन गया।

साहित्यकी महिमा ओसी ही है | साहित्य पाठ नहीं पढ़ाता, दृष्टि देता है। साहित्य जोबनका सिफ़े अहीपन है, रहस्योद्घाटन है, साक्षात्तरण है।

हे साहित्यगुरों परमात्मन्‌ , तेरे अवतारके सहश ब्राह्मो साहित्यकार अस दुनियामें भेज दे दुनिया श्रापदगरस्त है, शान्ति प्रदान कर; असे कृतार्थे कर |

--+फरवरी १६३७

सौन्दयेका मे श्डृ

दर सौन्दयका मे

साहित्य की भाषा मानो अेक बतेन “है साहित्यका मूल्य जिस बातसे निधोरित होता है कि हम अस बर्तनमें किस का माल भरना चाहते हैं

कुछ लोग सममभते हैं कि साहित्यकी सारी कल्पना असके रूप और सौन्दयेपर रची हुओ है। कोआओ भी बिचार या कल्पना अगर आकषेक रूपमें रखी हुओ हो, ,असमेंसे चमत्कृति पेदा होती हो तो वह साहित्य है। भारी से भारी मूल्यबान विचार या अनुभव और आसमानतक अड़नेघाली कल्पना अगर रोचक रूपमें रखी गयी हो तो असे हम साहित्य कहेंगे। असे दर्शन कहो, धर्मेशास््र कहो या सनन्‍्तवाणी कहो | असे आप साहित्य नहीं कह सकते |

असके विपरीत अगर कोआ विचार बिलकुल मामूली हो, कल्पना छिंछली हो, आदर्श हलका और समाजबिनाशक हो, लेकिन श्रगर वह मनोरंजन करता हो और असका स्वरूप चित्ता- कषेक हो तो वह अश्व कोटिका साहित्य कहा जायगा। मनो- विनोद, चित्ताकषेश और रूपलावण्य ही साहित्यका प्राण है

जिसमें कोओ शक नहीं कि कोओ भी वागब्यापार अगर चित्ताकषेक रूपमें पेश किया गया होता तो हम असे सरस साहित्यके तौरपर नहीं पहचानते, लेकिन श्रगर श्रस साहित्यमें आया हुआ विचार हीन हो, अनुभव छिछला हो, और कल्पना सड़ी हुओ हो तो सिफ्र रूपपरसे ही हम असे अत्तम साहित्य नहीं कहते

अब जरा रूपका स्वरूप जांच लें कोओ भी युवक अथवा युवती शरीर और मनसे निसेग हो, ज्यायाम, संयम तथा प्रस-

रश्छ जीवन-साहित्य

झतासे असने अपने यौवनकी अच्छी रक्षा की हो तो असमें अपने- आप ही अमुक मात्रामें सौन्दर्य ही जाता है। यह सौन्दये साबुनसे, तरह-तरहके खुशबूदार तेलोंका अस्तेमाल करनेसे या नये ढंगके अनेक रंग और दवाइयां लगानेसे नहीं सकता। आरोग्य और यौवन स्वयं है सुन्दर होता है सुन्दरता और आक्षकता अश्रमकी सहज सुवास होती है। लेकिन असके बिप- रीत अगर शरीर बीमार हो, मन विरकृत हो, स्वभाव स्वार्थी, चिड़चिड़ा या अहं प्रेमी हो और यह सब छिपानेके लिये कपड़ों की सजाबट, शिष्टाचारकी तमीज़ और हालचालके नाज़ नखरों द्वारा सौन्दर्य लाया गया है। तो कुछ भूखे लोग अस चमक दमकसे भले ही आकर्षित हो जाये, लेकिन जानकार, स्वच्छ अभिरुचि रखनेवाले लोग यह सारा प्रयास देखकर दुखी ही होंगे, श्रुनके मनमें ग्लानि ही पेदा होगी।

साहित्यका भी औसा ही है साहित्य जीवनका प्रतीक है। जोबन अगर निरोग, प्रसन्न, सेवापरायण, प्रेमपूर्ण और पराक्रमी होगा तो अ्रुसके सभी व्यापार आकर्षक और प्रभावशाली होंगे। जिस विचारमें आरयंता है, अुदात्तता है, सबे-मंगलकारी कल्याण की भावना है असका शब्दशरीर आप ही आप भाव-गंभीर, ललित-कोमल और प्रसादपूर्ण होगा अश्च साहित्य सुन्दर होता ही है, लेकिन सजधज करनेसे कोओ साहित्य अुध या शिष्ट नहीं होता

असलिये केबल साहित्यकोी अपासना करनेके बजाय अगर हम आये और प्रसन्न जीवनकी अपासना करें तो साहित्यकी सुन्दरता स्वयं ही फूट निकलेगी बृत्तिकी आयंता द्वी शिष्टाचार था तमीज़को आत्मा है निरा शिष्टाचार हास्यास्पद होता है या दिलको अुकता देता है। खोखली सौन्दर्योपासता अससे अन्य कोओ असर पैदा नहीं कर सकती।

प्राद्यीन साहित्य श्र

लिस साहित्यमें प्रगतिशील जीवनकी प्रेरणा अथवा प्रति- ध्वनि हो वह साहित्य प्रगतिशील है। ओसे साहित्यमें और सब कुछ हो या हो, अनुकरण तो हरगिज्ञ नहीं होना चाहिये। दूसरा कुछ हो या हो, अद्देश्यका अभाव तो कभी नहीं होना

चाहिये “-जून १६३७

प्राचीन साहित्य ,

साहित्यकारोंने कबिताकी तुलना कान्वासे की है। शास्त्रकारोंने कुटुम्बमें ख्लरीकी जिस प्रतिष्ठाकी कल्पना की है वही प्रतिष्ठा संस्कारी जीवनमें साहित्यकी भी है। जो समाज स्त्रोकी प्रतिष्ठाको भूल जाता है बह साहित्यकी क़दर भी क्‍या करेगा जो मनुष्य जीवन-भर ब्रत-नियमादि कियां करता है, असे थह भान नहीं रहता कि हम कहां थे और कहां जा रहे हैं | अस के लिए भूत और भविष्य दोनों शून्य हैं। क्‍या हमारे टीकाकारों- का भी यही हाल हो गया होगा ? संस्कृत-साहित्यके रहस्यथको अकट कर देनेवाले टीकाकार कम नहीं हैं यदि साहित्यका कुरुचषेत्र करना हो तो हमारे टीकाकारोंकी सेना अतनी घड़ी है कि वह जिस देशको चाहे हरा सकती है। परन्त साहित्यको ब्यापक दृष्टिसे देखना किसीको सूका ही नहीं जिस तरह कालिदास पुष्पक विमानमें बेठकर लझ्डासे अयोध्या तकके 228 निरीक्षण विहग-दृष्टिसे कर सके, अथवा यक्षपर दया करके बह हिसगिरिसे अलकापुरी तक भेप्रकों/मैंजें मी सरह ओक भी टीकाकारको यह नहीं ) ८28 बह्द खण्डका समग्र अवलोकन करे जिस आीणा

श्६्‌ जीवन-साहित्य

मनुष्योंका हीं मनोरज्षन कर सकती है, असका सज्जीत किसी महासभामें व्याप्त नहीं हो सकता, असी तरह टीकाकारोंकीं दृष्टे भी ओक सम्पर्श श्छोफके बाहर नहीं पहुंचती ज्यादा-से ज्यादा यदि अन्होंने यह बता दिया कि नान्‍्दीका ह्छोक सम्पणे नाटककी वस्तुओंको किस तरह सूचित करता है, तो बे कृतार्थ हो जाते हैं | हमारे साहित्य-मीमांसक भी जितनी गहराईमें अतर सके हैं, अतने विस्तारसे नहीं देख सके वे ओक 'छोकके भीतर दस-पांच अलंकारोंकी संस्ृष्टि सिद्ध कर सकते हैं, परन्त यह बतलाना वे अपना कत्तेज्य नहीं समझते कि ओक सम्पणे महा- काव्य या खण्डकाब्य किस तरह अकराग है और असका आत्मा किसमें है? असका 'अपवाद-रूप ओक क्षेमेन्द्र माना जा सकता है। जिस काश्मोरी महाकविने अलंकार ओर रसोंके बाद औचित्यका महत्व बतला दिया है | अ्सने ओक ही कविके ओक ही ःोकका रस निचोड़नेके बदले संस्कृत-साहित्यके बत्तीस विख्यात कवियोंकी भिन्न-भिन्न काब्य-कृतियोंकों लेकर उनके गुण और दोषोंकी विवेचना की हैं यह निष्पक्ष कषि दोषोंको बताते समय अपने दोषोंको भी ध्यानमें लाना नहीं भूला तथापि यह कल्पना तो केमेन्द्रकों भी नहीं सूक्ो थी कि श्रेक सम्पर्णे नाटक अथवा काव्य लेकर असके रहस्यकी खोज की जाय। अिसकी दृष्टि से औचित्य था--

पदे वाक्ये प्रबन्‍धार्थ गुणे5ल्ंकरणे रसे

क्रियायां कारके दिंगे वचने विशेषण

डपसगें निपाते काले देशे कुछे बसे

तत्वे सस्वे 5प्यमिप्राये स्वभावे सार-रू परदे

प्रतिभायाप्रवस्‍्थायों जिचारे नाभ्यथाशिविं।

काव्जस्थांगेषु प्राहुरौचित्यं ब्यापि लोवितस्‌

जितनी ही जगहोंमें औंचित्य-विचारकी चना” करके ककि

प्राचीन साहित्य रश््

शक गया है। रवीन्द्रनाथने हमें साहित्यकी ओर देखनेकी ओकः नशञ्री दृष्टि दी है

जैसे नाटक कान्यका निष्कषे है, असी तरह कवि भी सामा- जिक जीवन, राष्ट्रीय आकांक्षा, जातीय आदर्श श्रथवा प्रजाकी वेदनाओंकी स्वयंभू मूर्ति है जब कोई भट्टनारायण 'बेणी- संहार” लिखता है, तब द्रौपदीका क्रोध, भीमकी प्रतिशा, कर्ण- का सत्सर और अश्वत्थामाकी जलनका चित्र खींचनेके बाद बह राष्ट्रीय अ॒त्थान और पतनकी मीमांसा भी अपने हंगसे करना चाहता है जब कालिदास 'रघुवंश” लिखने बैठते हैं तब रघुके कुलकी ही नहीं किन्तु अखिल आरये-संस्कृतिकी प्रकृति ओर बिक्ृतिको अंकित कर देना चाहते हैं।

हमारे कवियोंकी ऋृतियोंकी ओर अतिहासिक श्रथवा सामा- ज़िक दृष्टिसे देखनेको वृत्ति भले ही पश्चिमी लोगोंने हमें समाई हो, परन्तु रब॑'न्द्रनाथका आये-हृदय तो संस्कृति-साहित्य की ओर आय-दृष्टिसे ही देख सका है जिस प्रकार एक समर्थ चित्रकार केवल दस-पांच ल्करोंसे ही सम्परण चित्रकों सूचित कर सकता है असो तरह रबी'न्द्रनाथने भिन्न-भिन्न प्रसंगांपर लिखे हुए पांच-सात स्पुट निबन्धोंसे ही यह सब दिखा दिया है कि संस्कृत-साहित्य क्या है, संस्कृत कवि का हृदय केसा हे, हिन्दुस्तानका अतिहास किस पुरुषार्थकों लेकर बैठा है,अित्यादि। संस्कृत कवियोंमें अतिहासिक दृष्टि भले ही दो, परन्तु अुनमें अतिहासिक हृदय तो अवश्य है। सामाजिक सुख-दु खोंकी प्रति- ध्वनि अनके हृदयोंसे ज़रूर अठती है। राष्ट्रके आुत्कपषके साथ नें आनन्दित होते हैं और अुसकी मूछांके साथ भूर्छित। लोगोंका अध:पात देखकर उनका हृदय रोठा है, और जब ऐसा होता है. बेर 8 आर मनोहर बचनोंसे समाज़को सचेत करना ष्ब

श्प जीवन-पाहित्य